गुरु ग्रंथ साहिब 630 · Raag Sorath · Guru Arjan Dev Ji
1हे दयालु परमेश्वर ! सभी जीव तेरे ही पैदा किए हुए हैं और
2अपने भक्तों का तू ही पोषण करता है।
3तेरी महिमा बड़ी अदभुत है और
4नानक तो नित्य ही तेरा नाम-सिमरन करता रहता है॥ २॥ २३॥ ८७ ॥
5सोरठि महला ५ ॥
6नारायण सदा मेरे साथ है,
7अतः यमदूत मेरे निकट नहीं आता।
8वह प्रभु अपने गले से लगाकर मेरी रक्षा करता है।
9सतगुरु की शिक्षा सत्य है॥ १॥
10पूर्ण गुरु ने पूर्ण कार्य किया है,
11उसने समस्त दुश्मनों को मार कर भगा दिया है और मुझ दास को सुमति दी है॥ १॥ रहाउ॥
12प्रभु ने समस्त स्थानों को बसा दिया है और
13मैं फिर सकुशल घर लौट आया हूँ।
14नानक का कथन है कि मैंने तो प्रभु की शरण ली है,
15जिसने सभी रोग मिटा दिए हैं।॥ २॥ २४॥ ८८ ॥
16सोरठि महला ५ ॥
17सतगुरु सर्व सुखों का दाता है. अतः हमें उसकी शरण में ही जाना चाहिए।
18उसके दर्शन एवं साक्षात्कार होने से आनंद प्राप्त होता है और हरि का गुणगान करने से दु:खों का नाश हो गया है॥ १॥
19हे भाई ! हरि-रस का पान कीजिए।
20नाम का जाप करो, नाम की आराधना करो एवं पूर्ण गुरु की शरण प्राप्त करो॥ रहाउ ॥
21हे भाई ! उसे ही नाम की प्राप्ति होती है, जिसके भाग्य में जन्म से पूर्व ही लिखा होता है और वही पूर्ण पुरुष होता है।
22हे प्रभु जी ! नानक यही निवेदन करता है कि मेरी वृति तेरे नाम-सिमरन में ही लीन रहे॥२॥२५॥८९॥
23सोरठि महला ५ ॥
24करने-करवाने में समर्थ अन्तर्यामी प्रभु अपने भक्तों की स्वयं ही रक्षा करता है।
25जो व्यक्ति गुरु-शब्द के रस को चखता है, उसकी सारी दुनिया के भीतर बड़ी जय-जयकार (कीर्ति) होती है॥ १ ॥
26हे प्रभु जी ! हे विश्व के मालिक ! मुझे तो केवल तेरा ही सहारा है।
27तू बड़ा समर्थ एवं शरण दाता है और आठ प्रहर मैं तेरा ही ध्यान-मनन करता हूँ॥ रहाउ॥
28जो व्यक्ति तेरा भजन करता है, उसे कोई चिंता स्पर्श नहीं करती।
29सतगुरु के चरणों में लगने से मेरा भय मिट गया है और अपने मन में भगवान का गुणगान करता हूँ॥ २॥
30सतगुरु ने मुझे ऐसा दिलासा दिया है कि अब मुझे सहज सुख एवं अधिकतर आनंद प्राप्त हो गया है।
31मैं विकारों पर विजय प्राप्त करके बड़ी शोभा से अपने घर आया हूँ और सारी आशा पूरी हो गई है॥ ३॥
32पूर्ण गुरु की मति भी पूर्ण है और उस प्रभु के कार्य भी पूर्ण हैं।
33नानक का कथन है कि गुरु के चरणों में लगकर, हरि-नाम का भजन करते हुए मैं भवसागर से पार हो गया हूँ॥४॥२६॥९०॥
34सोरठि महला ५ ॥
35दीन व्यक्तियों के दुःख नाश करने वाला प्रभु मुझ पर मेहरबान हो गया है और उसने स्वयं ही सारी विधि बनाई है।
36पूर्ण गुरु ने एक क्षण में ही बंधन काटकर अपने सेवक की रक्षा की है ॥ १॥
37हे मेरे मन ! सदा गोविन्द गुरु का ध्यान करते रहना चाहिए,
38ध्यान करने से तन के सभी क्लेश मिट जाते हैं और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है॥ रहाउ॥
39वह प्रभु अत्यंत ऊँचा, अगम्य एवं अपार है, जिसने समस्त जीव-जन्तुओं की रचना की है।
40नानक का कथन है कि जिन्होंने सत्संगति में भगवान के नाम का ध्यान किया है, दरबार में उनका मुख उज्ज्वल हो गया है॥२॥२७॥९१॥
41सोरठि महला ५ ॥
42मैं तो अपने मालिक को ही स्मरण करता हूँ और
43दिन-रात सदैव उसका ध्यान करता हूँ।
44जिसने अपना हाथ देकर रक्षा की है,
45मैंने हरि-नाम के महारस का पान किया है॥ १॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं