सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 628 · Raag Sorath · Guru Arjan Dev Ji

1हे संतो! अब हर जगह सुख ही सुख हो गया है।

2मेरा पूर्ण परब्रह्म परमेश्वर सब में समा रहा है॥ रहाउ॥

3यह वाणी परमात्मा से आई है,

4जिसने सारी चिंता मिटा दी है।

5दयालु परमपुरुष प्रभु मुझ पर बड़ा मेहरबान है।

6नानक तो सत्य (परमेश्वर) की ही बात करता है॥ २॥१३॥७७॥

7सोरठि महला ५ ॥

8प्रभु ही लोक-परलोक में हमारा रक्षक है,

9वह सतगुरु दीनदयालु है

10वह स्वयं ही अपने सेवकों की रक्षा करता है और

11सुन्दर शब्द प्रत्येक हृदय में गूंज रहा है॥ १॥

12मैं अपने गुरु के चरणों पर कुर्बान जाता हूँ और

13दिन-रात, श्वास-श्वास से उसका ही सिमरन करता हूँ जो (पूर्ण परमेश्वर) सर्वव्यापक है॥ रहाउ॥

14प्रभु स्वयं ही मेरा सहायक बन गया है।

15मुझे उस सच्चे प्रभु का सच्चा सहारा प्राप्त है।

16नानक का कथन है कि हे प्रभु ! यह तेरी भक्ति की ही बड़ाई है, जो

17उसने तेरी शरण प्राप्त कर ली है॥ २॥ १४ ॥ ७८॥

18सोरठि महला ५ ॥

19जब पूर्ण सतगुरु को भला लगा तो ही

20मैंने सर्वव्यापी राम-नाम का जाप किया।

21गोविन्द ने जब मुझ पर कृपा की तो

22उसने हमारी लाज बचा ली॥ १॥

23भगवान के सुन्दर चरण हमेशा ही सुखदायक हैं।

24प्राणी जैसी भी इच्छा करता है, उसे वही फल मिल जाता है और उसकी आशा निष्फल नहीं जाती॥ रहाउ॥

25जिस पर प्राणपति दाता अपनी कृपा करता है वही संत उसका गुणगान करता है।

26जब परब्रह्म प्रभु के मन को अच्छा लगता है तो ही मन प्रेम-भक्ति में लीन होता है॥ २॥

27आठ प्रहर भगवान का यशगान करने से माया की विषैली ठगौरी का असर नष्ट हो गया है।

28मेरे कर्तार-प्रभु ने मुझे अपने साथ मिला लिया है एवं साधु-संत मेरे साथी बन गए हैं।॥ ३॥

29प्रभु ने मुझे हाथ से पकड़ कर सर्वस्व प्रदान करके अपने साथ विलीन कर लिया है।

30हे नानक ! मैंने पूर्ण सतगुरु को पा लिया है, जिनके द्वारा मेरे सभी कार्य सम्पूर्ण हो गए हैं।॥ ४॥ १५॥ ७६ ॥

31सोरठि महला ५ ॥

32नम्रता हमारी गदा है और

33सबके चरणों की धूल बनना हमारा खण्डा है।

34इन शस्त्रों के समक्ष कोई विकारों से ग्रस्त दुराचारी टिक नहीं सकता,

35इस बात की सूझ पूर्ण गुरु ने प्रदान की है ॥ १॥

36परमेश्वर का नाम संतों का सशक्त सहारा है।

37जो नाम-स्मरण करता है, उसकी मुक्ति हो जाती है और प्रभु का नाम-स्मरण करने से करोड़ों जीवों का उद्धार हो गया है॥ १॥ रहाउ॥

38संतों के संग भगवान का यशगान किया है और

39हरि-नाम रूपी यह पूर्ण धन हमें प्राप्त हो गया है।

40नानक का कथन है कि जब से हमने अपना आत्माभिमान मिटाया है तो

41सर्वत्र परब्रहा ही नजर आया है॥ २॥ १६ ॥ ८० ॥

42सोरठि महला ५ ॥

43पूर्ण गुरु ने प्रत्येक कार्य पूर्ण किया है और

44मुझ पर अपनी कृपा कर दी है।

45मैं हमेशा आनंद एवं सुख प्राप्त करता हूँ।

46गुरु ने मुझे समस्त स्थानों पर सुखी बसा दिया है॥ १॥

47भगवान की भक्ति समस्त फल प्रदान करने वाली है।

48पूर्ण गुरु ने कृपा करके भक्ति की देन प्रदान की है और कोई विरला पुरुष ही भक्ति के महत्व को समझता है।॥ रहाउ ॥

49हे भाई ! मधुर गुरुद्राणी का गायन करो,

50क्योंकि यह हमेशा ही फलदायक एवं सुख देने वाली है।

51हे नानक ! जिसने भगवान का नाम-सिमरन किया है,

52उसे वही प्राप्त हो गया है जो पूर्व ही उसके भाग्य में लिखा हुआ था॥२॥१७॥८१॥

53सोरठि महला ५ ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं