गुरु ग्रंथ साहिब 623 · Raag Sorath · Guru Arjan Dev Ji
1जिसने पूर्णतया मेरी लाज बचा ली है॥ ३॥
2मैं वही कुछ बोलता हूँ जो तू मुझ से बुलवाता है
3हे मेरे मालिक ! तू गुणों का गहरा सागर है।
4हे नानक ! सत्य नाम का जाप करो वही परलोक में साक्षी होगा।
5भगवान ने अपने दास की लाज बचा ली ॥४॥६॥५६॥
6सोरठि महला ५ ॥
7कर्ता पुरुष स्वयं आकर खड़ा हुआ है
8और मेरा एक बाल भी बांका नहीं हुआ।
9गुरु ने मेरा स्नान सफल कर दिया है।
10हरि-परमेश्वर का सिमरन करने से मेरे किल्विष-पाप नाश हो गए हैं ॥ १॥
11हे संतो ! रामदास का सरोवर उत्कृष्ट है,
12जो कोई भी इस में स्नान करता है, उसकी वंशावलि का उद्धार हो जाता है और वह अपनी आत्मा का भी कल्याण कर लेता है॥ १ ॥ रहाउ ॥
13जगत उसकी जय-जयकार करता है और
14उसे मनोवांछित फल मिल जाता है।
15वह स्वस्थ हो जाता है, जो यहाँ आकर स्नान करता है और प्रभु का ध्यान करता है ।॥ २ ॥
16जो संतों के सरोवर में स्नान करता है,
17उस व्यक्ति को परमगति मिल जाती है।
18उसका जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है
19जो हरि-नाम का ध्यान करता है ॥ ३॥
20वही यह ब्रह्म विचार समझता है,
21जिस पर भगवान दयालु होता है।
22नानक का कथन है कि हे बाबा ! जो प्रभु की शरण में आता है उस
23की समस्त चिंताएँ एवं संकट मिट जाते हैं।॥ ४॥ ७ ॥ ५७ ॥
24सोरठि महला ५ ॥
25परब्रह्म ने मेरा पूरा साथ निभाया है और
26कोई बात अधूरी नहीं रह गई।
27गुरु ने अपने चरणों से लगाकर मुझे भवसागर से पार कर दिया है और
28अब मैं हरि-नाम का सिमरन करता हूँ॥ १॥
29भगवान सदा ही अपने दास का रखवाला है।
30अपनी कृपा करके अपना हाथ देकर उसने हमारी ऐसे रक्षा की है, जैसे माता-पिता पालन-पोषण करते हैं।॥ १॥ रहाउ॥
31बड़ी किस्मत से मुझे सतगुरु मिला है,
32जिसने मृत्यु का मार्ग मिटा दिया है।
33मेरा चित्त तो भगवान की प्यारी भक्ति में लग गया है।
34वह बड़े भाग्यशाली हैं, जो भगवान का जाप करते हुए जीवित रहते हैं।॥ २॥
35दास हरि की अमृत वाणी गाता रहता है और
36संतों की चरण-धूलि में ही स्नान करता है।
37उसने स्वयं ही मुझे अपना नाम दिया है और
38कर्ता प्रभु ने स्वयं ही मेरी रक्षा की है॥ ३॥
39हरि के दर्शन ही मेरे प्राणों का आधार है और
40यही पूर्ण एवं पवित्र विचार है।
41हे अन्तर्यामी प्रभु ! मुझ पर कृपा करो चूंकि
42दास नानक तो अपने स्वामी की शरण में ही आया है॥ ४ ॥ ८॥ ५८ ॥
43सोरठि महला ५ ॥
44पूर्ण गुरु ने जब मुझे अपने चरणों में लगा लिया तो
45मैंने भगवान को अपने साथी एवं सहायक के रूप में पा लिया।
46जहाँ कहीं भी मैं जाता हैं, उधर ही मैं सुखी हूँ।
47प्रभु ने कृपा करके मुझे अपने साथ मिला लिया है॥ १॥
48सदैव ही श्रद्धा से भगवान का गुणगान करो,
49इससे सभी मनोवांछित फल प्राप्त कर लो और भगवान आत्मा का साथीं एवं सहायक बना रहेगा।॥ १॥ रहाउ ॥
50नारायण हमारे प्राणों का आधार है।
51हम तो संतजनों की चरण-धूलि हैं।
52मुझ पतित को प्रभु ने पावन कर दिया है।
53उसने कृपा करके हरि-यश की देन प्रदान की है॥ २॥
54परब्रह्म-प्रभु हमेशा ही मेरा पालन-पोषण करता है।
55वह सदा ही मेरी आत्मा का रखवाला है।
56हमें तो रात-दिन हरि का कीर्तन ही गायन करना चाहिए,
57जिसके फलस्वरूप प्राणी बार-बार योनियों में नहीं पड़ता॥ ३॥
58जिसे अकालपुरुष विधाता देता है,
59वही हरि के अमृत रस को अनुभव करता है और
60मृत्यु का दूत उसके निकट नहीं आता।
61हे नानक ! प्रभु की शरण में मुझे सुख प्राप्त हो गया है॥ ४॥ ६॥ ५६॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं