गुरु ग्रंथ साहिब 414 · Raag Aasaa · Guru Nanak Dev Ji
1उसकी काया प्रभु की अनूप ज्योति से सोना हो जाती है और
2वह सभी तीन लोकों में प्रभु का स्वरूप देख लेता है।
3मेरे दामन में प्रभु नाम का सच्चा एवं अक्षय धन है॥ ४॥
4प्रभु पाँच तत्वों, माया के तीन गुणों, नवखण्डों एवं चारों दिशाओं में व्यापक हुआ है।
5अपनी सत्ता कायम करके वह धरती एवं गगन को सहारा दे रहा है।
6प्रभु प्राणी के बाहर दौड़ते हुए मन को उल्ट कर सन्मार्ग पर ले आता है॥ ५ ॥
7जो मूर्ख है, वह अपनी आत्मिक आँखों से नहीं देखता।
8उसकी जिह्म रस नहीं देती और जो कुछ उसे कहा जाता है, वह उसे नहीं समझता।
9वह विषैली माया में मस्त होकर दुनिया के साथ झगड़ता रहता है॥ ६॥
10उत्तम संगति करने से इन्सान उत्तम बन जाता है।
11ऐसा मनुष्य गुणों के पीछे भागता है और अपने अवगुणों को मिटा देता है।
12गुरु की सेवा के बिना सहज सुख प्राप्त नहीं होता।॥ ७॥
13प्रभु का नाम हीरा, जवाहर एवं माणिक है।
14इन्सान का मोती जैसा अनमोल मन उस स्वामी का धन है।
15हे नानक ! प्रभु भक्तजनों की परख करता है और कृपादृष्टि से उन्हें कृतार्थ कर देता है॥ ८॥ ५॥
16आसा महला १ ॥
17गुरु के माध्यम से ही ज्ञान, ध्यान एवं मन को संतोष प्राप्त होते हैं।
18गुरु के समक्ष होकर ही प्रभु का महल पहचाना जाता है।
19गुरुमुख बनकर ही प्रभु का नाम मनुष्य की सुरति में प्रगट हो जाता है। १॥
20इस तरह प्रभु की प्रेम-भक्ति का चिन्तन किया जाता है।
21गुरुमुख बन कर ही मुरारी प्रभु का सत्यनाम प्राप्त होता है॥ १॥ रहाउ ॥
22जो गुरुमुख बनता है वह दिन-रात निर्मल रहता है और सुन्दर स्थान में बसता है।
23उसे तीन लोकों का ज्ञान हो जाता है।
24सच्चे गुरु के माध्यम से प्रभु का हुक्म पहचाना जाता है॥ २॥
25वह सच्ची प्रसन्नता प्राप्त करता है और उसे कोई दु:ख स्पर्श नहीं करता।
26वह अमृत ज्ञान एवं महारस का आनंद प्राप्त करता है।
27उसके कामादिक पाँचों विकार नष्ट हो जाते हैं और वह सारी दुनिया में सुखी हो जाता है॥ ३॥
28हे प्रभु ! तेरी ज्योति सब में मौजूद है और हर कोई तेरा ही है।
29वह स्वयं ही मिलाता और स्वयं ही जुदा करता है।
30जो कुछ सृजनहार प्रभु स्वयं करता है, वही होता है॥ ४॥
31ईश्वर स्वयं ही सृष्टि को ध्वस्त करके स्वयं ही निर्मित करता है, उसके हुक्म अनुसार ही सृष्टि पुनः उसमें समा जाती है।
32जो कुछ उसे अच्छा लगता है, उसके हुक्म अनुसार हो जाता है।
33गुरु के बिना कोई भी पूर्ण प्रभु को प्राप्त नहीं कर सकता ॥ ५॥
34प्राणी को बाल्यावस्था एवं वृद्धावस्था में कोई होश नहीं होती।
35भरपूर यौवन में वह अभिमान में डूब जाता है।
36नाम के बिना वह मूर्ख क्या प्राप्त कर सकता है?॥ ६॥
37मनुष्य उस प्रभु को नहीं जानता, जिसका दिया अन्न एवं धन वह इस्तेमाल करता है।
38दुविधा में कुमार्गगामी होकर वह तदुपरांत पछताता है।
39परन्तु मूर्ख मनुष्य के गले में मोह की फाँसी पड़ी हुई है॥ ७॥
40इस संसार को (मोह-माया में) डूबता हुआ देखकर मनुष्य भयभीत होकर भाग जाते हैं।
41जिनकी सच्चे गुरु ने रक्षा की है, वे बड़े भाग्यशाली हैं।
42हे नानक ! वे गुरु के चरणों से लग जाते हैं।॥ ८॥ ६॥
43आसा महला १ ॥
44कुछ लोग भगवान के भजन गीत गाते हैं लेकिन उनके चित्त में बुरे विचार होते हैं।
45वह राग सुना कर विद्वान कहलाते हैं,
46लेकिन नाम के बिना उनके मन में झूठ और बुरे विचार भरे रहते हैं।॥ १॥
47हे मन ! तुम कहाँ जाते हो ? अपने हृदय घर में ही वास करो।
48गुरुमुख राम के नाम से तृप्त हो जाते हैं और खोज करने से वह सहज ही प्रभु को ढूंढ लेते हैं।॥ १॥ रहाउ॥
49जिस व्यक्ति के मन में काम-क्रोध निवास करते हैं, उसे शरीर का मोह चिपका रहता है।
50लालच, लोभ एवं अहंकार उसके मन को बहुत दुखी करते हैं।
51राम के नाम बिना मन को धैर्य कैसे आ सकता है?॥ २॥
52जो मनुष्य अपने अन्तर्मन को नाम सरोवर में स्नान कराता है, वह सत्य को पहचान लेता है।
53गुरुमुख अपने अन्तर्मन की गति को स्वयं ही जानता है।
54सच्चे शब्द के बिना प्रभु का महल अनुभव नहीं किया जा सकता॥ ३॥
55जो अपने आकार को निरंकार प्रभु में लीन कर देता है और
56सर्वकला सम्पूर्ण सत्य में बसता है,
57वह मनुष्य दोबारा योनियों में प्रवेश नहीं करता॥ ४॥
58जहाँ नाम मिलता है, तुम वहीं जाओ।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं