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गुरु ग्रंथ साहिब 412 · Raag Aasaa · Guru Nanak Dev Ji

1जो कुछ उसे अच्छा लगता है, संसार में वही होता है।

2हे भर्तृहरि योगी ! सुन, नानक तुझे विचार की बात कहता है,

3उस प्रभु का निर्मल नाम मेरे जीवन का सहारा है॥ ८ ॥ १॥

4आसा महला १ ॥

5मनुष्य अधिकतर जप-तप एवं समस्त चतुराई के बावजूद

6बियावान में भटकता है और उसे प्रभु-प्राप्ति का मार्ग नहीं मिलता।

7सत्य के बोध बिना कोई भी स्वीकार नहीं होता।

8नामविहीन मनुष्य के सिर पर धूल ही पड़ती है॥ १॥

9संसार जन्मता मरता रहता है लेकिन सृष्टि का स्वामी सत्यस्वरूप है।

10जो मनुष्य गुरु की शरणागत प्रभु का सेवक बनता है, वह जन्म-मरण से छूट जाता है॥ १॥ रहाउ ॥

11यह जगत सांसारिक मोह एवं अनेक आशाओं में बंधा हुआ है।

12लेकिन कई मनुष्य गुरमति के माध्यम से मोह से निर्लिप्त हो जाते हैं।

13उनके अन्तर्मन में नाम विद्यमान है और उनका हृदय कमल खिल जाता है।

14उन्हें मृत्यु का कोई डर नहीं रहता ॥ २॥

15स्त्री के मोह ने सारे जगत को जीत लिया है और यह जगत नारी से मोह करता है।

16पुत्रों एवं पत्नी के मोह में फँसकर मनुष्य ने प्रभु-नाम को भुला दिया है।

17इस प्रकार मनुष्य जीवन निरर्थक गंवा देता है और जीवन की बाजी हार जाता है।

18सतिगुरु की सेवा सर्वश्रेष्ठ करनी है॥ ३॥

19जो खुले तौर पर अहंत्व के वचन बोलता है,

20उसके हृदय को मोक्ष का लेपन कदाचित नहीं होता।

21जो मनुष्य गुरु के शब्द में लीन होकर माया का मोह जला देता है,

22वह निर्मल नाम का सदैव ही हृदय में सुमिरन करता है॥ ४॥

23वह अपने भटकते हुए मन पर अंकुश लगाता है और इसे जकड़ कर बांधकर रखता है।

24ऐसे शिष्य की संगति प्रभु के करम से ही प्राप्त होती है।

25गुरु के बिना मनुष्य कुमार्गगामी हो जाता है और जन्म मरण के चक्र में फँस जाता है।

26यदि प्रभु कृपा-दृष्टि करे तो वह मनुष्य को अपने संयोग में मिला लेता है॥ ५॥

27हे भगवान ! तू अति सुन्दर है लेकिन यदि मैं बताने का प्रयास करूँ तो उसका वर्णन नहीं कर सकता।

28यदि मैं अकथनीय प्रभु का कथन करूँ तो मैं उसका मूल्यांकन नहीं कर सकता।

29हे प्रभु ! सभी दुख एवं सुख तेरी इच्छा अनुसार ही मिलते हैं।

30सत्यनाम में सभी दुख मिट जाते हैं।॥ ६ ॥

31जब शब्द की सूझ होती है तो प्राणी हाथों के बिना ही बाजा बजाता है और पैरों के बिना ही नृत्य किए ताल बना रहता है।

32यदि वह शब्द के भेद को समझ ले तो सत्य को देख लेगा।

33जब सच्चा परमात्मा अन्तर्मन में विद्यमान है तो सभी सुख मनुष्य के साथ हैं।

34अपनी दया करके सबका रखवाला प्रभु प्राणी की रक्षा करता है॥ ७॥

35जो मनुष्य अपना अहंत्व मिटा देता है, उसे तीन लोकों की सूझ हो जाती है।

36जो मनुष्य वाणी को समझता है, वह सत्य में समा जाता है।

37हे प्राणी ! निरन्तर प्रीति के साथ एक शब्द का ध्यान करो।

38हे नानक ! अपने भक्तों का जीवन संवारने वाला प्रभु धन्य है॥ ८ ॥ २॥

39आसा महला १ ॥

40अनेकों ने भगवान के स्वरूप के अन्तर्गत असंख्य ही लेख लिखे हैं, लेकिन वह उसके स्वरूप का वर्णन नहीं कर सके। उन्होंने लेख लिख-लिख कर अपनी विद्वता का झूठा मान ही पाया है।

41जब इन्सान का मन सच्चे से संतुष्ट हो जाता है तो ही वह सुरति द्वारा बखान करता है।

42केवल मुख की बातें एवं बार-बार पढ़ना एक व्यर्थ भार है।

43असंख्य धार्मिक ग्रंथ हैं परन्तु अपार प्रभु अकथनीय ही रहता है॥ १॥

44हे प्राणी ! तू समझ ले कि एक सत्यस्वरूप परमात्मा ही ऐसा है।

45यह जन्म-मरण भी उस प्रभु की रजा ही समझ॥ १॥ रहाउ॥

46इस दुनिया को मृत्यु ने माया के मोह में फँसा कर बांधा हुआ है।

47नाम-सुमिरन करने से बन्धनों में फँसा हुआ मनुष्य मोह-माया से छूट सकता है।

48गुरु ही सुखों का दाता है इसलिए किसी अन्य की खोज मत कर।

49इस लोक एवं परलोक में वह तेरा साथ निभाएगा ॥ २॥

50यदि मनुष्य शब्द-गुरु द्वारा मोह-माया से निर्लिप्त हो जाए तो उसकी लगन एक ईश्वर से लग जाती है।

51यदि वह खाए न जाने वाले कामादिक को विनष्ट कर दे तो उसकी दुविधा निवृत्त हो जाती है।

52नाम को हृदय में बसाने से मनुष्य जीवनमुक्त हो जाता है।

53यदि मनुष्य गुरुमुख बन जाए तो वह सत्य में समा जाता है॥ ३॥

54जिसं प्रभु ने धरती, गगन, आकाश की सृजना की है और

55जिसने सारी दुनिया बनाई है, जो निर्माण करके स्वयं ही नाश कर देता है,

56वह रचयिता प्रभु स्वयं ही सवके भीतर व्यापक है।

57वह किसी से परामर्श नहीं करता और स्वयं ही क्षमा कर देता है॥ ४॥

58हे जग के रचयिता ! तू स्वयं ही भरपूर सागर है, तू स्वयं ही माणिक्य-हीरा है।

59तू बड़ा निर्मल, सदैव सत्य एवं गुणों का भण्डार है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं