गुरु ग्रंथ साहिब 411 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji
1उसे सब लोग यहीं छोड़कर चले गए हैं।
2यह वस्तुएं उसे स्वप्न की भाँति लगती हैं
3जो हरि का नाम-सुमिरन करता है। १॥
4हरि को छोड़कर जो विकारों में फँसे हुए हैं,
5वे जन्म-मरण की तरफ भाग कर जाते हैं।
6जो भक्तजन परमात्मा को प्राप्त होते हैं,
7वे आत्मिक तोर पर जीवित रहते हैं।
8हे नानक ! जिस पर भगवान कृपालु हो जाता है,
9वही उसका भक्त है॥२॥७॥१६३॥२३२॥
10ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
11रागु आसा महला ९ ॥
12(हे भाई !) मैं मन की हालत किसे वर्णन करूँ ?
13यह लोभ में ग्रस्त है और धन की आशा करके यह दसों दिशाओं की ओर भागता फिरता है॥ १॥ रहाउ ॥
14सुख की खातिर वह बहुत दुःख सहन करता है और जन-जन की सेवा खुशामद करता रहता है।
15वह कुत्ते की भाँति द्वार-द्वार पर भटकता रहता है और राम के भजन की सूझ ही नहीं होती ॥ १॥
16वह अपना मूल्यवान मनुष्य-जन्म निरर्थक ही गंवा देता है और लोगों की तरफ से हो रहे हंसी-मजाक की उसे लज्जा नहीं।
17नानक का कथन है कि (हे जीव !) तुम हरि का यश क्यों नहीं गाते, इससे तेरे तन की खोटी बुद्धि दूर हो जाएगी॥ २॥ १॥ २३३॥
18रागु आसा महला १ असटपदीआ घरु २
19ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
20मनुष्य को पाप की दुष्कर घाटी से उतर कर सत्संग रूपी गुणों के सरोवर में स्नान करना चाहिए।
21उसे व्यर्थ नहीं बोलना चाहिए और भगवान के गुण गाते रहना चाहिए।
22वायुमण्डल में जल की भाँति उसे प्रभु में लीन रहना चाहिए।
23सत्य की प्रसन्नता का मंथन करके उसे महा रस अमृत का पान करना चाहिए॥ १॥
24हे मेरे मन ! ऐसा ज्ञान सुनो।
25प्रभु सर्वत्र व्यापक है और सबको सहारा दे रहा है। १॥ रहाउ॥
26जो मनुष्य सत्य को अपना व्रत एवं नियम बनाता है, काल उसे दुखी नहीं करता और
27सच्चे गुरु के शब्द से वह अपने क्रोध को जला देता है।
28वह दसम द्वार(उच्घमण्डल) में निवास करता है और समाधि की अवस्था धारण कर लेता है।
29वह गुरु रूपी पारस को स्पर्श करके परम पद प्राप्त कर लेता है॥ २ ॥
30प्राणी को अपने मन की खातिर सत्य के तत्व का मंथन करना चाहिए और
31अपनी मलिनता को धोने के लिए नामामृत के सरोवर में स्नान करना चाहिए।
32जिसके साथ वह रंग जाता है, मनुष्य उस जैसा हो जाता है।
33जो कुछ कर्ता प्रभु स्वयं करता है, वही होता है॥ ३॥
34बर्फ जैसे शीतल हृदय वाले गुरु से मिलकर मनुष्य अपनी तृष्णाग्नि को बुझाए।
35जो गुरु के द्वारा बतलाई सेवा में अपनी सुरति लगाता है, वह मानो यह विभूति अपने शरीर पर मलता है।
36सहज घर में बसना उसका धार्मिक वेष होवे और
37निर्मल वाणी उसका नाद बजाना॥ ४॥
38अन्तर्मन का ज्ञान श्रेष्ठ महा रस है।
39गुरु-वाणी का विचार तीर्थ-स्थल का स्नान है।
40अन्तर्मन में प्रभु का निवास ही पूजा है।
41यह मनुष्य ज्योति को ईश्वरीय ज्योत से मिलाने वाला है॥ ५॥
42जिस का मन नाम-रस में भीगा रहता है, जिसकी मति एक प्रभु के प्रेम में लगी रहती है।
43ऐसा व्यक्ति राजसिंहासन पर विराजमान होने वाले प्रभु में समा जाता है।
44परमात्मा की रज़ा में चलना ही उसकी प्रतिदिन की दिनचर्या एवं दैनिक कमाई हो जाती है।
45अविगत प्रभु जाना नहीं जा सकता ॥ ६॥
46जैसे कमल जल में से उत्पन्न होता है और जल से दूर रहता है,
47इसी तरह प्रभु की ज्योति समस्त जीवों में सर्वव्यापक है।
48मैं किसे प्रभु के निकट एवं किसे दूर कहूँ?
49उस परमात्मा को सर्वव्यापक देखकर मैं गुणों के भण्डार का यशोगान करता हूँ॥ ७॥
50भीतर एवं बाहर प्रभु के अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं