सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 283 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji

1तुझे वह कुछ मिलेगा, जो तेरे पूर्व जन्म के कर्मों द्वारा लिखा हुआ है।

2प्रभु दुःख एवं सुख देने वाला है।

3अन्य सब कुछ छोड़कर तू उसकी ही आराधना कर।

4परमात्मा जो कुछ करता है, उसको सुख समझ।

5हे मूर्ख ! तुम क्यों भटकते फेिरते हो।

6कौन-सी वस्तु तेरे साथ आई है।

7हे लालची परवाने ! तुम सांसारिक ऐश्वर्य-भोग में मस्त हो रहे हो ?

8तू अपने मन में राम के नाम का जाप कर।

9हे नानक ! इस तरह तुम सम्मानपूर्वक अपने धाम (परलोक) को जाओगे ॥ ४॥

10(हे जीव !) जिस सौदे को लेने लिए तू दुनिया में आया है,

11वह राम नाम रूपी सौदा संतों के घर से मिलता है।

12अपने अभिमान को त्याग दे, राम का नाम अपने हृदय में तोल और अपने मन से इसे खरीद।

13अपना सौदा लाद ले और संतों के संग चल।

14माया के दूसरे जंजाल त्याग दे।

15हरेक तुझे धन्य ! धन्य ! कहेगा।

16उस प्रभु के दरबार में तेरा मुख उज्ज्वल होगा।

17यह व्यापार कोई विरला व्यापारी ही करता है।

18हे नानक ! मैं ऐसे व्यापारी पर सदा बलिहारी जाता हूँ॥ ५ ॥

19(हे जीव !) साधुओं के चरण धो-धोकर पी।

20साधुओं पर अपनी आत्मा भी अर्पण कर दे,

21साधुओं के चरणों की धूलि से स्नान कर।

22साधु पर कुर्बान हो जाना चाहिए।

23साधु की सेवा सौभाग्य से ही मिलती है।

24साधु की संगति में हरि का भजन गान करना चाहिए।

25साधु अनेक विघ्नों से मनुष्य की रक्षा करता है।

26जो प्रभु की गुणस्तुति करता है, वह अमृत रस को चखता है।

27जिसने संतों का सहारा पकड़ा है और उनके द्वार पर आ गिरा है,

28हे नानक ! वह सर्व सुख प्राप्त कर लेता है॥ ६॥

29परमात्मा मृतक प्राणी को भी जीवित करने वाला है।

30वह भूखे को भी भोजन प्रदान करता है।

31तमाम खजाने उसकी दृष्टि में हैं।

32(परन्तु प्राणी) अपने पूर्व जन्म के किए कर्मो का फल भोगते हैं।

33सबकुछ उस परमात्मा का ही है और वही सब कुछ करने में समर्थावान है।

34उसके अलावा कोई दूसरा न ही था और न ही होगा।

35हे जीव ! दिन-रात सदैव उसकी आराधना कर।

36यह जीवन-आचरण सबसे ऊँचा एवं पवित्र है।

37जिस पुरुष पर परमात्मा ने कृपा धारण करके अपना नाम प्रदान किया है,

38हे नानक ! वह पवित्र हो जाता है॥ ७ ॥

39जिसके मन में गुरु जी पर आस्था है,

40वह मनुष्य हरि-प्रभु को स्मरण करने लग जाता है।

41वह तीनों लोकों में प्रसिद्ध भक्त हो जाता है

42जिसके ह्रदय में एक ईश्वर विद्यमान होता है।

43उसका कर्म सत्य है और जीवन-मर्यादा भी सत्य है।

44उसके मन में सत्य है और वह अपने मुख से सत्य ही बोलता है।

45उसकी दृष्टि सत्य है और उसका स्वरूप भी सत्य है।

46वह सत्य बांटता है और सत्य ही फैलाता है।

47हे नानक ! जो पुरुष पारब्रह्म को सत्य समझता है,

48वह पुरुष सत्य में ही समा जाता हैII ८ ॥ १५ ॥

49श्लोक॥

50परमेश्वर का न कोई रूप अथवा चिन्ह है और न ही कोई रंग है। वह माया के तीनों गुणों से परे है।

51हे नानक ! परमात्मा स्वयं उस पुरुष को समझाता है, जिस पर स्वयं प्रसन्न होता है॥ १॥

52अष्टपदी ॥

53(हे जीव !) अपने मन में अनश्वर प्रभु को याद रख

54और मनुष्य का प्रेम (मोह) त्याग दे।

55उससे परे कोई वस्तु नहीं।

56वह एक ईश्वर समस्त जीव-जन्तुओं के भीतर मौजूद है।

57वह स्वयं सबकुछ देखने वाला और स्वयं ही सब कुछ जानने वाला है।

58प्रभु अथाह गम्भीर, गहरा एवं परम बुद्धिमान है।

59वह पारब्रह्म, परमेश्वर एवं गोबिन्द

60कृपा का भण्डार, बड़ा दयालु एवं क्षमाशील है।

61हे प्रभु ! तेरे साधुओं के चरणों पर नतमस्तक होवे

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं