सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 281 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji

1परमात्मा जिस पर अपनी कृपा करता है, उसे ही अपना नाम दे देता है।

2हे नानक ! ऐसा व्यक्ति बड़ा भाग्यशाली है॥ ८ ॥ १३॥

3श्लोक ॥

4हे भद्रपुरुषो ! अपनी चतुराई त्याग कर हरि-परमेश्वर का सिमरन करो।

5अपने मन में भगवान की आशा रखो। हे नानक ! इस तरह दुख, भ्रम एवं भय दूर हो जाएँगे ॥ १॥

6अष्टपदी ॥

7(हे प्राणी !) किसी मनुष्य पर भरोसा रखना सब व्यर्थ है।

8एक भगवान ही सब को देने वाला है।

9जिसके देने से ही तृप्ति होती है

10और फिर तृष्णा आकर नहीं लगती।

11एक ईश्वर स्वयं ही मारता है और रक्षा करता है।

12मनुष्य के वश में कुछ भी नहीं है।

13उसका हुक्म समझने से सुख उपलब्ध होता है।

14उसके नाम को पिरोकर अपने कण्ठ में डालकर रखो।

15हे नानक ! उस प्रभु को हमेशा स्मरण करते रहो,

16कोई विघ्न नहीं आएगा ॥ १॥

17अपने मन में परमात्मा की महिमा-स्तुति करो।

18हे मेरे मन ! सत्य का कार्य-व्यवहार कर।

19नाम का अमृत पान करने से तेरी जिव्हा पवित्र हो जाएगी

20और तू अपनी आत्मा को हमेशा के लिए सुखदायक बना लेगा।

21अपने नेत्रों से ईश्वर का कौतुक देख।

22सत्संगति में मिलने से दूसरे तमाम मेल-मिलाप लुप्त हो जाते हैं।

23अपने चरणों से गोबिन्द के मार्ग पर चलो।

24एक क्षण भर के लिए भी हरि का जाप करने से पाप मिट जाते हैं।

25प्रभु की सेवा करो और कानों से हरि कथा सुनो।

26हे नानक ! (इस प्रकार) प्रभु के दरबार में तेरा मस्तक उज्ज्वल हो जाएगा ॥ २॥

27दुनिया में वही व्यक्ति भाग्यशाली हैं,

28जो हमेशा भगवान की महिमा गाते रहते हैं।

29जो व्यक्ति राम के नाम का चिन्तन करते रहते हैं,

30वही व्यक्ति जगत् में धनवान गिने जाते हैं।

31जो व्यक्ति अपने मन, तन एवं मुख से परमेश्वर के नाम का उच्चारण करते हैं,

32समझ लीजिए कि वे हमेशा सुखी हैं।

33जो पुरुष केवल एक प्रभु को ही पहचानता है,

34उसे इहलोक एवं परलोक का ज्ञान हो जाता है।

35हे नानक ! जिसका मन ईश्वर के नाम में मिल जाता है,

36वह प्रभु को पहचान लेता है॥ ३॥

37गुरु की कृपा से जो व्यक्ति अपने आपको समझ लेता है,

38जान लीजिए कि उसकी तृष्णा मिट गई है।

39जो व्यक्ति संतों की संगति में हरि-परमेश्वर का यश करता रहता है,

40वह प्रभु भक्त तमाम रोगों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है।

41जो व्यक्ति रात-दिन केवल ईश्वर का भजन ही बखान करता है,

42वह अपने गृहस्थ में ही निर्लिप्त रहता है।

43जिस मनुष्य ने एक ईश्वर पर आशा रखी है,

44उसके लिए मृत्यु का फँदा कट जाता है।

45जिसके मन में पारब्रह्म की भूख है,

46हे नानक ! उसको कोई दुख नहीं लगता ॥ ४ ॥

47जिसको हरि-प्रभु मन में याद आता है,

48वह संत सुखी है और उसका मन कभी नहीं डगमगाता।

49जिस पर ईश्वर अपनी कृपा धारण करता है,

50कहो वह सेवक किससे डर सकता है?

51जैसा ईश्वर है, वैसा ही उसको दिखाई देता है।

52अपनी रचना में प्रभु स्वयं ही समाया हुआ है।

53अनेक बार विचार करके विचार लिया है।

54गुरु की कृपा से समस्त वास्तविकता को समझ लिया है।

55जब मैं देखता हूँ तो सबकुछ परमात्मा ही है।

56हे नानक ! वह स्वयं ही सूक्ष्म और स्वयं ही अस्थूल है॥ ५॥

57न कुछ जन्मता है, न कुछ मरता है।

58भगवान अपनी लीला स्वयं ही करता है।

59जन्म-मरण, गोचर(द्रश्य) एवं अगोचर(अद्रश्य)-

60यह समूचा जगत् उसने अपने आज्ञाकारी बनाए हुए हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं