सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 280 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji

1हे नानक ! यदि संत को भला लगे तो निंदक भी मोक्ष प्राप्त कर लेता है॥ २ ॥

2संत की निन्दा करने वाला सबसे बुरे कर्म करने वाला महानीच है।

3संत की निन्दा करने वाले को क्षण भर भी सुख नहीं मिलता।

4संत की निन्दा करने वाला महा हत्यारा है।

5संत की निन्दा करने वाला परमेश्वर की ओर से तिरस्कृत होता है।

6संत की निन्दा करने वाला शासन से रिक्त रहता है।

7संत की निन्दा करने वाला दुखी तथा निर्धन हो जाता है।

8संत की निन्दा करने वाले को सर्व रोग लग जाते हैं।

9संत की निन्दा करने वाला सदा वियोग में रहता है।

10संत की निंदा दोषों का भी दोष महापाप है।

11हे नानक ! यदि संत को भला लगे तो उसकी भी मुक्ति हो जाती है।॥ ३॥

12संत का दोषी सदैव अपवित्र है।

13संत का दोषी किसी भी मनुष्य का मित्र नहीं होता।

14संत के दोषी को (धर्मराज से) दण्ड मिलता है।

15संत के दोषी को सभी त्याग देते हैं।

16संत का दोषी महा अहंकारी होता है।

17संत का दोषी सदैव पापी होता है।

18संत का दोषी जन्मता-मरता रहता है।

19संत का निन्दक सुख से खाली हो जाता है।

20संत के दोषी को कोई रहने का स्थान नहीं मिलता।

21हे नानक ! यदि संत को लुभाए तो वह उसको अपने साथ मिला लेता है॥ ४॥

22संत का दोषी बीच में टूट जाता है।

23संत का दोषी किसी काम में सफल नहीं होता।

24संत का दोषी भयानक जंगलों में भटकता रहता है।

25संत का दोषी कुमार्ग में डाल दिया जाता है।

26संत का दोषी वैसे ही भीतर से खाली होता है,

27जैसे मृतक व्यक्ति का शव श्वास के बिना होता है।

28संत के दोषी की जड़ बिल्कुल ही नहीं होती।

29जो कुछ उसने बोया है, वह स्वयं ही खाता है।

30संत के दोषी का कोई भी रक्षक नहीं हो सकता।

31हे नानक ! यदि संत को भला लगे तो वह उसको बचा लेता है॥ ५ ॥

32संत का दोषी यूं विलाप करता है,

33जैसे जल के बिना मछली दुःख में तड़पती है।

34संत का दोषी हमेशा भूखा ही रहता है और तृप्त नहीं होता,

35जैसे अग्नि ईंधन से तृप्त नहीं होती।

36संत का दोषी वैसे ही अकेला पड़ा रहता है,

37जैसे भीतर से जला हुआ तिल का पौधा खेत में व्यर्थ पड़ा रहता है।

38संत का दोषी धर्म से भ्रष्ट होता है।

39संत का दोषी सदा झूठ बोलता रहता है।

40निन्दक का भाग्य आदि से ही ऐसा लिखा हुआ है।

41हे नानक ! जो कुछ प्रभु को भला लगता है, वही होता है॥ ६॥

42संत का दोषी बदसूरत रूप वाला हो जाता है।

43संत पर दोष लगाने वाला ईश्वर के दरबार में दण्ड प्राप्त करता है।

44संत का दोषी सदा मृत्यु-निकट होता है।

45संत का दोषी जीवन एवं मृत्यु के बीच लटकता है।

46संत के दोषी की आशा पूर्ण नहीं होती।

47संत का दोषी निराश चला जाता है।

48संत को दोषी को स्थिरता प्राप्त नहीं होती।

49जैसे ईश्वर की इच्छा होती है, वैसा ही मनुष्य हो जाता है।

50कोई भी व्यक्ति पूर्व जन्म के कर्मों को मिटा नहीं सकता।

51हे नानक ! वह सच्चा प्रभु सब कुछ जानता है॥ ७ ॥

52समस्त जीव-जन्तु उस परमात्मा के हैं।

53उसको हमेशा प्रणाम करते रहो।

54भगवान का गुणानुवाद दिन-रात करते रहो।

55अपने प्रत्येक श्वास एवं ग्रास से उसका ही ध्यान करते रहो।

56सब कुछ उस (परमात्मा) का किया ही होता है।

57ईश्वर जैसे मनुष्य को बनाता है, वैसा ही वह बन जाता है।

58अपनी खेल का वह स्वयं ही निर्माता है।

59दूसरा कौन उसका विचार कर सकता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं