सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 279 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji

1धन-दौलत की तलाश में उसकी तृप्ति नहीं होती।

2इन्सान अधिकतर विषय-विकारों के भोग में लगा रहता है,

3परन्तु वह तृप्त नहीं होता और उसकी अभिलाषा करता हुआ मर मिटता है।

4संतोष के बिना किसी को तृप्ति नहीं होती।

5उसके सब कार्य स्वप्न के मनोरथ की भाँति व्यर्थ हैं।

6भगवान के नाम रंग द्वारा सर्व सुख प्राप्त हो जाते हैं।

7किसी भाग्यशाली इन्सान को ही नाम की प्राप्ति होती है।

8प्रभु स्वयं सब कुछ करने तथा जीवों से कराने में समर्थ है।

9हे नानक ! हरि के नाम का जाप सदैव करो ॥५॥

10केवल परमात्मा ही करने एवं कराने वाला है।

11विचार कर देख लो, प्राणी के वश में कुछ नहीं।

12जैसी दृष्टि परमात्मा धारण करता है, मनुष्य वैसा ही हो जाता है।

13वह प्रभु स्वयं ही सब कुछ है।

14जो कुछ उसने किया है, वह उसकी इच्छा के अनुकूल है।

15वह सबसे दूर है, फिर भी सबके साथ है।

16वह समझता, देखता और निर्णय करता है।

17परमात्मा स्वयं ही एक है और स्वयं ही अनेक रूप है।

18परमात्मा न ही मरता है और न ही नाश होता है, वह न ही आता है और न ही जाता है।

19हे नानक ! परमात्मा सदा सब में समाया हुआ है ॥६॥

20वह स्वयं ही उपदेश देता है और स्वयं ही समझता है।

21परमात्मा स्वयं ही सबके साथ मिला हुआ है।

22अपना विस्तार उसने स्वयं ही किया है।

23प्रत्येक वस्तु उसकी है, वह सृजनहार है।

24बताओ, उससे अलग कुछ हो सकता है ?

25एक ईश्वर स्थानों एवं उनकी सीमाओं पर सर्वत्र मौजूद है।

26अपनी लीलाओं को वह स्वयं ही करने वाला है।

27वह कौतुक रचता है और उसके रंग अनन्त हैं।

28(जीवों के) मन में स्वयं वास कर रहा है, (जीवों को) अपने मन में स्थिर किए बैठा है।

29हे नानक ! उस (परमात्मा) का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता ॥ ७॥

30जगत् का स्वामी परमात्मा सदैव सत्य है।

31यह बात गुरु की कृपा से किसी विरले ने ही बखान की है।

32परमात्मा जिसने सवकी रचना की है, वह भी सत्य है।

33करोड़ों में कोई विरला ही उसको जानता है।

34हे प्रभु ! तेरा रूप कितना भला-सुन्दर है।

35हे ईश्वर ! तुम अत्यंत सुन्दर, अपार एवं अनूप हो।

36हे परमात्मा ! तेरी वाणी अति पवित्र, निर्मल एवं मधुर है।

37प्रत्येक व्यक्ति इसको कानों से सुनता एवं व्याख्या करता है।

38वह पवित्र पावन हो जाता है

39हे नानक ! जो व्यक्ति अपने मन में प्रेम से भगवान के नाम का जाप करता है। ॥ ८ ॥ १२ ॥

40शलोक॥

41जो व्यक्ति संतों की शरण में आता है, उस व्यक्ति का उद्धार हो जाता है।

42हे नानक ! संतों की निन्दा करने से प्राणी पुनः पुनः जन्म लेता रहता है॥ १॥

43अष्टपदी॥

44संत को दुखी करने से मनुष्य की आयु कम हो जाती है।

45संत को दुःखी करने से मनुष्य यमदूतों से नहीं बच सकता।

46संत को दुखी करने से मनुष्य के समस्त सुख नाश हो जाते हैं।

47संत को दुखी करने से मनुष्य नरक में जाता है।

48संत को दुखी करने से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है।

49संत को दुखी करने से मनुष्य की शोभा समाप्त हो जाती है।

50संत से तिरस्कृत पुरुष की कोई भी रक्षा नहीं कर सकता।

51संत को दुखी करने से स्थान भ्रष्ट हो जाता है।

52यदि कृपा के घर संत स्वयं कृपा करे तो

53हे नानक ! सत्संगति में निंदक भी (भवसागर से) पार हो जाता है॥ १॥

54संत को दुखी करने से मुख अष्ट हो जाता है।

55संत को दुखी करने वाला पुरुष कोए के समान निन्दा करता रहता है।

56संत को दुखी करने से मनुष्य सर्पयोनि में पड़ता है।

57संत को दुखी करने वाला मनुष्य कीड़े इत्यादि की त्रिगद योनि में भटकता है।

58संत को दुखी करने वाला मनुष्य तृष्णा की अग्नि में जलता रहता है।

59संत को दुखी करने वाला सबके साथ छल-कपट करता रहता है।

60संत को दुखी करने से मनुष्य का सारा तेज-प्रताप नाश हो जाता है।

61संत को दुखी करने से मनुष्य नीचों का महानीच हो जाता है।

62संत के दोषी का कोई सुख का सहारा नहीं रहता।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं