गुरु ग्रंथ साहिब 277 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji
1उसकी ताकत का कोई ओर-छोर नहीं।
2अपने हुक्म द्वारा उसने धरती की स्थापना की है और बिना किसी सहारे के उसने (टिकाया) रखा हुआ है।
3जो कुछ उसके हुक्म द्वारा उत्पन्न हुआ है, अन्त में उसके हुक्म में लीन हो जाता है।
4भले तथा बुरे कर्म उसकी इच्छा (रज़ा) अनुसार हैं।
5उसके हुक्म द्वारा अनेकों प्रकार के खेल-तमाशे हो रहे हैं।
6सृष्टि-रचना करके वह अपनी महिमा को देखता रहता है।
7हे नानक ! ईश्वर समस्त जीवों में समा रहा है॥ १॥
8यदि प्रभु को भला लगे तो मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
9यदि प्रभु को भला लगे तो पत्थर को भी पार कर देता है।
10यदि प्रभु को भला लगे तो श्वासों के बिना भी प्राणी को (मृत्यु से) बचाकर रखता है।
11यदि प्रभु को भला लगे तो मनुष्य ईश्वर की गुणस्तुति करता रहता है।
12यदि प्रभु को भला लगे तो वह पापियों का भी उद्धार कर देता है।
13ईश्वर स्वयं ही सब कुछ करता है और स्वयं ही विचार करता है।
14ईश्वर स्वयं ही लोक-परलोक का स्वामी है।
15अन्तर्यामी प्रभु जगत्-खेल खेलता रहता है और (इसे देखकर) खुश होता है।
16जो कुछ प्रभु को लुभाता है, वही काम मनुष्य से करवाता है।
17हे नानक ! उस जैसा दूसरा कोई नजर नहीं आता ॥ २ ॥
18बताओ, मनुष्य से कौन-सा काम हो सकता है?
19जो ईश्वर को भला लगता है, वही (काम) प्राणी से करवाता है।
20यदि मनुष्य के वश में हो तो वह हरेक पदार्थ सँभाल ले।
21जो कुछ परमात्मा को उपयुक्त लगता है, वह वही कुछ करता है।
22ज्ञान न होने के कारण मनुष्य विषय-विकारों में मग्न रहता है।
23यदि वह जानता हो तो वह अपने आपको (विकारों से) बचा ले।
24भ्रम में भूला हुआ उसका मन दसों दिशाओं में भटकता रहता है।
25चारों कोनों में चक्कर काट कर वह एक क्षण में वापिस लौट आता है।
26जिसे कृपा करके प्रभु अपनी भक्ति प्रदान करता है।
27हे नानक ! वह पुरुष नाम में लीन हो जाता है॥ ३॥
28क्षण में ही ईश्वर कीड़े समान निम्न (पुरुष) को (राज्य प्रदान करके) राजा बना देता है।
29भगवान गरीबो पर दया करने वाला है।
30जिस प्राणी का कोई गुण दिखाई नहीं देता,
31उसे क्षण भर में तुरन्त ही दसों दिशाओं में लोकप्रिय कर देता है।
32विश्व का स्वामी जगदीश जिस पर अपनी कृपा-दृष्टि कर देता है,
33वह उसके कर्मों का लेखा-जोखा नहीं गिनता।
34यह आत्मा एवं शरीर सब उसकी दी हुई पूंजी है।
35पूर्ण ब्रह्म का प्रत्येक हृदय में प्रकाश है।
36यह सृष्टि-रचना उसने स्वयं ही रची है।
37हे नानक ! मैं उसकी महिमा को देखकर जी रहा हूँ॥ ४॥
38इस जीव का बल इसके अपने हाथ में नहीं है क्योकि
39सबका मालिक एक परमात्मा ही सबकुछ करने एवं जीव से कराने वाला है,
40बेचारा जीव तो परमात्मा का आज्ञाकारी है।
41जो कुछ ईश्वर को भला लगता है, अंतः वही होता है।
42मनुष्य कभी उच्च जातियों एवं कभी निम्न जातियों में बसता है।
43कभी वह दुःख में दुखी होता है और कभी खुशी में प्रसन्नता से हंसता है।
44कभी निन्दा करना ही उसका व्यवसाय होता है।
45कभी वह आकाश में होता है और कभी पाताल में।
46कभी वह ब्रह्म विचार का ज्ञाता होता है।
47हे नानक ! ईश्वर मनुष्य को अपने साथ मिलाने वाला स्वयं ही है॥ ५॥
48यह जीव कभी अनेक प्रकार के नृत्य कर रहा है।
49कभी वह दिन-रात सोया रहता है।
50कभी वह अपने महाक्रोध में भयानक हो जाता है।
51कभी वह सब की चरण-धूलि बना रहता है।
52कभी वह महान राजा बन बैठता है।
53कभी वह नीच भिखारी का वेष धारण कर लेता है।
54कभी वह अपकीर्ति (बदनामी) में आ जाता है।
55कभी वह बहुत भला कहलवाता है।
56जिस तरह प्रभु उसको रखता है, वैसे ही जीव रहता है।
57गुरु की कृपा से नानक सत्य ही कहता है॥ ६॥
58कभी मनुष्य पण्डित बनकर उपदेश देता है।
59कभी वह मौनधारी साधु बनकर ध्यान लगाए बैठा है।
60कभी वह तीर्थों के किनारे जाकर स्नान करता है।
61कभी वह सिद्ध, साधक बनकर मुख से ज्ञान करता है।
62कभी मनुष्य कीड़ा, हाथी अथवा पतंगा बना रहता है
63और अनेक योनियों में लगातार भटकता रहता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं