गुरु ग्रंथ साहिब 276 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji
1कई करोड़ देवते, राक्षस एवं इन्द्र हैं, जिनके सिर पर छत्र हैं।
2ईश्वर ने सारी सृष्टि को अपने (हुक्म के) धागे में पिरोया हुआ है।
3हे नानक ! जो जो परमात्मा को भला लगता है, उसे ही वह भवसागर से पार कर देता है॥ ३ ॥
4कई करोड़ रजोगुणी, तमोगुणी एवं सतोगुणी जीव हैं।
5कई करोड़ वेद, पुराण, स्मृतियां एवं शास्त्र हैं।
6कई करोड़ समुदों में रत्न पैदा कर दिए हैं।
7कई करोड़ विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तु हैं।
8करोड़ों प्राणी लम्बी आयु वाले बनाए गए हैं।
9(परमात्मा के हुक्म द्वारा) कई करोड़ ही सोने के सुमेर पर्वत बन गए हैं।
10कई करोड़ यक्ष, किन्नर एवं पिशाच हैं।
11कई करोड़ ही भूत-प्रेत, सूअर एवं शेर हैं।
12ईश्वर सबके निकट और सबके ही दूर है।
13हे नानक ! ईश्वर हरेक में परिपूर्ण हो रहा है, जबकि वह स्वयं निर्लिप्त रहता है॥ ४ ॥
14कई करोड़ जीव पाताल के निवासी हैं।
15कई करोड़ जीव नरकों तथा स्वगों में रहते हैं।
16कई करोड़ जीव जन्मते, जीते और मरते हैं।
17कई करोड़ जीव अनेक योनियों में भटक रहे हैं।
18कई करोड़ (व्यर्थ) बैठकर खाते हैं।
19करोड़ों ही जीव परिश्रम से थककर टूट जाते हैं।
20कई करोड़ जीव धनवान बनाए गए हैं।
21करोड़ों ही जीव धन-दौलत की चिन्ता में लीन हैं।
22ईश्वर जहाँ कहीं चाहता है, वहाँ ही वह जीवों को रखता है।
23हे नानक ! सब कुछ ईश्वर के अपने हाथ में है॥ ५ ॥
24इस दुनिया में कई करोड़ जीव वैराग्यवान बने हुए हैं
25और राम के नाम से उनकी वृत्ति लगी हुई है।
26करोड़ों ही जीव परमात्मा को खोजते रहते हैं
27और अपनी आत्मा में ही भगवान को पा लेते हैं।
28करोड़ों ही प्राणियों को ईश्वर के दर्शनों की प्यास (अभिलाषा) लगी रहती है,
29उन्हें अनश्वर प्रभु मिल जाता है।
30कई करोड़ प्राणी सत्संगति की माँग करते हैं।
31वे भगवान के प्रेम में ही मग्न रहते हैं।
32हे नानक ! जिन पर ईश्वर स्वयं सुप्रसन्न होता है,
33ऐसे व्यक्ति हमेशा ही भाग्यवान हैं।॥ ६॥
34धरती के नौ खण्डों एवं (चार) दिशाओं में करोड़ों ही प्राणी पैदा हुए हैं।
35कई करोड़ आकाश एवं ब्रह्माण्ड हैं।
36करोड़ों ही अवतार हो चुके हैं।
37कई युक्तियों से ईश्वर ने सृष्टि की रचना की है।
38इस सृष्टि का कई बार प्रसार हुआ है
39लेकिन परमात्मा हमेशा से एक ही है।
40कई करोड़ जीव ईश्वर ने अनेक विधियों के बनाए हैं।
41परमेश्वर से वे (जीव) उत्पन्न हुए हैं और परमेश्वर में ही समा गए हैं।
42उसके अन्त को कोई नहीं जानता।
43हे नानक ! वह परमेश्वर सब कुछ आप ही है ॥ ७॥
44इस दुनिया में कई करोड़ जीव परमात्मा के दास हैं
45और उनकी आत्मा में प्रकाश हो जाता है।
46कई करोड़ जीव तत्त्वज्ञाता हैं,
47और अपने नेत्रों से वे सदैव एक ईश्वर के दर्शन करते रहते हैं।
48कई करोड़ जीव नाम-रस पीते रहते हैं,
49जो अमर होकर हमेशा ही जीते हैं।
50करोड़ों ही जीव नाम का यशोगान करते रहते हैं।
51वे आत्म-रस के सुख में सहज ही समा जाते हैं।
52अपने भक्तों की प्रभु श्वास-श्वास से देखभाल करता है।
53हे नानक ! ऐसे भक्त ही परमेश्वर के प्रिय होते हैं॥ ८॥ १o ॥
54श्लोक॥
55एक ईश्वर ही सृष्टि का मूल कारण (सर्जक) है, उसके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं।
56हे नानक ! मैं उस ईश्वर पर कुर्बान जाता हूँ, जो जल, धरती, पाताल एवं आकाश में विद्यमान है॥ १॥
57अष्टपदी।
58हर कार्य करने और जीवों से कराने वाला एक ईश्वर सब कुछ करने में समर्थ है।
59जो कुछ उसे भला लगता है, वही होता है।
60वह क्षण भर में इस सृष्टि को उत्पन्न करने एवं नाश भी करने वाला (प्रभु) है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं