सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 274 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji

1ब्रह्मज्ञानी स्वयं ही निरंकार है।

2ब्रह्मज्ञानी की शोभा केवल ब्रह्मज्ञानी को ही बनती है।

3हे नानक ! ब्रह्मज्ञानी सबका मालिक है॥ ८ ॥ ८॥

4श्लोक ॥

5जो व्यक्ति अपने हृदय में भगवान के नाम को बसाता है,

6जो सब में भगवान के दर्शन करता है और

7क्षण-क्षण प्रभु को प्रणाम करता है,

8हे नानक ! ऐसा सत्यवादी निर्लिप्त महापुरुष समस्त प्राणियों का भवसागर से उद्धार कर देता है। १॥

9अष्टपदी।

10जो व्यक्ति जिव्हा से झूठ नहीं बोलता,

11जिसके हृदय में पवित्र प्रभु के दर्शनों की अभिलाषा बनी रहती है,

12जिसके नेत्र पराई नारी के सौन्दर्य को नहीं देखते,

13जो साधुओं की श्रद्धापूर्वक सेवा करता है और संतों की संगति से प्रेम करता है,

14जो अपने कानों से किसी की निन्दा नहीं सुनता,

15जो अपने आपको बुरा (निम्न) समझता है,

16जो गुरु की कृपा से बुराई को त्याग देता है,

17जो अपने मन की वासना अपने मन से दूर कर देता है

18और जो अपनी ज्ञान-इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर लेता है और पाँचों ही विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) से बचा रहता है,

19हे नानक ! करोड़ों में से कोई ऐसा विरला पुरुष 'अपरस' (पवित्र-पावन) होता है।॥ १॥

20जिस व्यक्ति पर परमात्मा प्रसन्न है, वही वैष्णय है।

21वह विष्णु की माया से अलग रहता है

22और शुभकर्म करता हुआ निष्कर्मी ही रहता है।

23उस वैष्णव का धर्म भी पवित्र है।

24वह किसी फल की इच्छा नहीं करता।

25वह केवल प्रभु-भक्ति एवं उसके कीर्तन में ही समाया रहता है।

26उसकी आत्मा एवं शरीर में सृष्टि के पालनहार गोपाल का सिमरन ही होता है।

27वह समस्त जीवों पर कृपालु होता है।

28वह स्वयं ईश्वर का नाम अपने मन में बसाता है और दूसरों से नाम का जाप करवाता है।

29हे नानक ! ऐसा वैष्णव परमगति प्राप्त कर लेता है॥ २॥

30जिसके चित्त में भगवान की भक्ति का प्रेम होता है, वही भगवान का वास्तविक भक्त है।

31वह समस्त दुष्टों की संगति त्याग देता है

32और उसके मन से हर प्रकार की दुविधा मिट जाती है।

33वह पारब्रह्म को हर जगह मौजूद समझता है और केवल उसकी ही पूजा करता है।

34जो साधुओं-संतों की संगति में रहकर पापों की मैल मन से निवृत कर देता है,

35ऐसे भक्त की बुद्धि उत्तम हो जाती है।

36वह अपने भगवान की नित्य सेवा करता रहता है।

37वह अपना मन एवं तन अपने प्रभु के प्रेम में समर्पित कर देता है।

38वह भगवान के चरण अपने हृदय में बसाता है।

39हे नानक ! ऐसा भक्त ही भगवान को प्राप्त करता है॥ ३॥

40पण्डित वही है, जो अपने मन को उपदेश प्रदान करता है।

41वह राम के नाम को अपने हृदय में खोजता है।

42जो राम-नाम का मीठा रस सेवन करता है।

43उस पण्डित के उपदेश द्वारा सारा जगत् जीता है,

44जो पण्डित हरि की कथा को अपने हृदय में बसाता है,

45ऐसा पण्डित दोबारा योनियों में प्रवेश नहीं करता।

46वह वेद, पुराणों एवं स्मृतियों के मूल तत्व का विचार करता है,

47वह दृष्टिगोचर संसार को अदृश्य प्रभु में अनुभव करता है

48और चारों ही वर्णो (जातियों) को उपदेश देता है।

49हे नानक ! उस पण्डित को सदैव ही प्रणाम है॥ ४ ॥

50समस्त मंत्रों का बीज मंत्र ज्ञान है।

51चारों ही वर्णो में कोई भी पुरुष नाम का जाप करे।

52जो जो नाम जपता है, उसकी गति हो जाती है।

53कोई पुरुष ही इसे सत्संगति में रहकर प्राप्त करता है।

54यदि प्रभु अपनी कृपा से हृदय में नाम बसा दे

55तो पशु, प्रेत, मूर्ख, पत्थर दिल भी पार हो जाते हैं।

56ईश्वर का नाम समस्त रोगों की औषधि है।

57भगवान की गुणस्तुति करना कल्याण एवं मुक्ति का रूप है।

58किसी युक्ति अथवा किसी धर्म-कर्म द्वारा ईश्वर का नाम प्राप्त नहीं किया जा सकता।

59हे नानक ! भगवान का नाम उस इन्सान को ही मिलता हैं, जिसकी किस्मत में आदि से ही लिखा होता है॥ ५॥

60जिसके मन में भगवान का निवास है,

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं