गुरु ग्रंथ साहिब 272 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji
1हे नानक ! साधुओं की संगति में रहने से मनुष्य-जन्म सफल हो जाता है॥ ५॥
2साधुओं की संगति करने से मनुष्य को मेहनत नहीं करनी पड़ती।
3साधुओं के दर्शनमात्र एवं भेंट से मनुष्य कृतार्थ हो जाता है।
4साधुओं की संगति करने से मनुष्य के तमाम पाप नाश हो जाते हैं।
5साधुओं की संगति करने से मनुष्य नरक से बच जाता है।
6साधुओं की संगति करने से प्राणी लोक-परलोक में सुखी हो जाता है।
7साधुओं की संगति करने से जो ईश्वर से जुदा हुए हैं, वे उससे मिल जाते हैं।
8साधुओं की संगति करने से मनुष्य जिस फल का वह इच्छुक होता है, उसे मिल जाता है
9साधुओं की संगति करने से वह खाली हाथ नहीं जाता।
10पारब्रह्म-प्रभु साधुओं के हृदय में निवास करता है।
11हे नानक ! साधुओं की जिव्हा से ईश्वर का नाम सुनकर जीव पार हो जाता है॥ ६॥
12साधु की संगति में रहकर भगवान का नाम सुनो।
13साधुओं की संगति में ईश्वर का गुणानुवाद करो।
14साधुओं की संगति में मनुष्य प्रभु को अपने हृदय से नहीं भुलाता।
15साधुओं की संगति में उसका निश्चित ही भवसागर से उद्धार हो जाता है।
16साधुओं की संगति में रहने से मनुष्य को प्रभु मीठा लगने लगता है।
17साधुओं की संगति में ईश्वर प्रत्येक हृदय में दिखाई देता है।
18साधुओं की संगति में मनुष्य ईश्वर का आज्ञाकारी हो जाता है।
19साधुओं की संगति में हमारी गति हो गई है।
20साधुओं की संगति में रहने से तमाम रोग मिट जाते हैं।
21हे नानक ! संयोग से ही साधु मिलते हैं।॥ ७॥
22साधु की महिमा वेद भी नहीं जानते।
23वे उनके बारे जितना सुनते हैं, उतना ही बखान करते हैं।
24साधु की उपमा (माया के) तीनों ही गुणों से दूर है।
25साधु की उपमा सर्वव्यापक है।
26साधु की शोभा का कोई अन्त नहीं।
27साधु की शोभा सदैव ही अनन्त है।
28साधु की शोभा उच्च -सर्वोच्च है।
29साधु की शोभा महानों में बड़ी महान है।
30साधु की शोभा केवल साधु को ही उपयुक्त लगती है।
31नानक का कथन है कि हे मेरे भाई ! साधु एवं प्रभु में कोई भेद नहीं ॥ ८ ॥ ७॥
32श्लोक ॥
33जिसके मन में सत्य है और मुँह में भी वही सत्य है
34और जो एक परमात्मा के अलावा किसी दूसरे को नहीं देखता,
35हे नानक ! यह गुण ब्रह्मज्ञानी के होते हैं।॥ १॥
36अष्टपदी ॥
37ब्रह्मज्ञानी हमेशा निर्लिप्त रहता है,
38जैसे जल में कमल का फूल स्वच्छ होता है।
39ब्रह्मज्ञानी सदा निर्दोष है,
40जैसे सूर्य समस्त (रसों को) सुखा देता है।
41ब्रह्मज्ञानी सबको एक आँख से देखता है,
42जैसे हवा राजा और कंगाल को एक समान लगती है।
43ब्रह्मज्ञानी की सहनशीलता एक समान होती है,
44जैसे कोई धरती को खोदता है और कोई चन्दन का लेप करता है।
45ब्रह्मज्ञानी का यही गुण है।
46हे नानक ! जैसे अग्नि का सहज स्वभाव होता है। १॥
47ब्रह्मज्ञानी निर्मल से भी परम निर्मल है,
48जैसे जल को मैल नहीं लगती।
49ब्रह्मज्ञानी के मन में यूं प्रकाश होता है जैसे
50पृथ्वी के ऊपर आकाश ।
51ब्रह्मज्ञानी के लिए मित्र एवं शत्रु एक समान होते हैं।
52ब्रह्मज्ञानी में थोड़ा-सा भी अभिमान नहीं होता।
53ब्रह्मज्ञानी उच्च -सर्वोच्च है।
54परन्तु अपने मन में वह सबसे निम्न होता है।
55हे नानक ! केवल वही पुरुष ब्रह्मज्ञानी बनता है,
56जिन्हें परमेश्वर स्वयं बनाता है ॥२॥
57ब्रह्मज्ञानी सबकी चरण-धूलि है।
58ब्रह्मज्ञानी आत्मिक आनन्द को अनुभव करता है।
59ब्रह्मज्ञानी सब पर कृपा करता है।
60ब्रह्मज्ञानी के पास कोई बुराई नहीं होती और वह कुछ भी बुरा नहीं करता।
61ब्रह्मज्ञानी सदैव समदर्शी होता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं