सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 271 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji

1प्रभु की कृपा से प्रकाश होता है।

2प्रभु की कृपा से हृदय-कमल प्रफुल्लित होता है।

3जब प्रभु सुप्रसन्न होता है, तो वह मनुष्य के हृदय में आ निवास करता है।

4प्रभु की दया से मनुष्य की बुद्धि उत्तम हो जाती है।

5हे प्रभु ! समस्त खजाने तेरी दया में हैं।

6अपने आप किसी को कुछ भी प्राप्त नहीं होता।

7हे हरि-परमेश्वर ! तुम जहाँ प्राणियों को लगाते हो, वे उधर ही लग जाते हैं।

8हे नानक ! इन प्राणियों के वश में कुछ नहीं है॥ ८ ॥ ६॥

9श्लोक॥

10वह पारब्रह्म प्रभु अगम्य एवं अनन्त है।

11जो कोई भी उसके नाम का जाप करता है, वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है।

12नानक प्रार्थना करता है, हे मेरे मित्र ! ध्यानपूर्वक सुन, साधुओं की कथा बड़ी अदभुत है॥ १॥

13अष्टपदी।

14साधुओं की संगति करने से मुख उज्ज्वल हो जाता है।

15साधुओं की संगति करने से विकारों की तमाम मैल दूर हो जाती है।

16साधुओं की संगति करने से अभिमान मिट जाता है।

17साधुओं की संगति करने से आत्म-ज्ञान प्रगट हो जाता है।

18साधुओं की संगति करने से प्रभु निकट ही रहता हुआ प्रतीत होता है।

19साधुओं की संगति करने से तमाम विवाद निपट जाते हैं।

20साधुओं की संगति करने से नाम-रत्न प्राप्त हो जाता है।

21साधुओं की संगति में मनुष्य केवल एक ईश्वर हेतु ही प्रयास करता है।

22कौन-सा प्राणी साधुओं की महिमा का वर्णन कर सकता है ?

23हे नानक ! साधुओं की शोभा प्रभु (की महिमा) में ही लीन हुई है॥ १॥

24साधुओं की संगति करने से अगोचर प्रभु मिल जाता है।

25साधुओं की संगति करने से प्राणी सदा प्रफुल्लित रहता है।

26साधुओं की संगति करने से पाँच शत्रु (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) वश में आ जाते हैं।

27साधुओं की संगति करने से मनुष्य अमृत रूप नाम का रस चख लेता है।

28साधुओं की संगति करने से मनुष्य सबकी धूलि बन जाता है।

29साधुओं की संगति करने से वाणी मनोहर हो जाती है।

30साधुओं की संगति करने से मन कहीं नहीं जाता।

31साधुओं की संगति करने से मन स्थिरता प्राप्त कर लेता है।

32साधुओं की संगति में यह माया से मुक्ति प्राप्त कर लेता है।

33हे नानक ! साधुओं की संगति में रहने से प्रभु सुप्रसन्न हो जाता है॥ २॥

34साधु की संगति करने से सभी दुश्मन भी मित्र बन जाते हैं।

35साधु की संगति करने से मनुष्य महापवित्र हो जाता है।

36साधुओं की संगति करने से वह किसी से वैर नहीं करता।

37साधुओं की संगति में रहने से मनुष्य कुमार्ग की ओर चरण नहीं करता।

38साधु की संगति करने से कोई बुरा दिखाई नहीं देता।

39साधुओं की संगति करने से मनुष्य महान सुख के मालिक ईश्वर को ही जानता है।

40साधुओं की संगति करने से मनुष्य के अहंकार का ताप उतर जाता है।

41साधुओं की संगति करने से मनुष्य तमाम अहंत्व को त्याग देता है।

42ईश्वर स्वयं ही साधुओं की महिमा को जानता है।

43हे नानक ! साधु एवं परमेश्वर का प्रेम परिपक्व हो जाता है॥ ३ ॥

44साधु की संगति करने से प्राणी का मन कभी नहीं भटकता।

45साधु की संगति करने से वह सदा सुख प्राप्त करता है।

46साधुओं की संगति करने से नाम रूपी अगोचर वस्तु प्राप्त हो जाती है।

47साधुओं की संगति करने से मनुष्य शिथिल न होने वाली शक्ति को सहन कर लेता है।

48साधुओं की संगति करने से प्राणी सर्वोच्च स्थान में निवास करता है।

49साधुओं की संगति में रहने से मनुष्य आत्मस्वरूप में पहुँच जाता है।

50साधुओं की संगति करने से प्राणी का धर्म पूरी तरह सुदृढ़ हो जाता है।

51साधुओं की संगति में रहने से मनुष्य केवल पारब्रह्म की ही आराधना करता है।

52साधुओं की संगति में रहने से मनुष्य नाम रूपी खजाना प्राप्त कर लेता है।

53हे नानक ! मैं उन साधुओं पर तन-मन से न्यौछावर हूँ॥ ४॥

54साधुओं की संगति द्वारा मनुष्य के समूचे वंश का उद्धार हो जाता है।

55साधुओं की संगति में रहने से मनुष्य के मित्र-सज्जन एवं परिवार का भवसागर से उद्धार हो जाता है।

56साधुओं की संगति में रहने से वह धन प्राप्त हो जाता है,

57जिस धन से हरेक पुरुष लाभ प्राप्त करता है और तृप्त हो जाता है।

58साधुओं की संगति में रहने से यमराज भी सेवा करता है।

59जो साधुओं की संगति में रहता है, देवदूत एवं देवते भी उसका यशोगान करते हैं।

60साधुओं की संगति करने से समूचे पाप नाश हो जाते हैं।

61साधुओं की संगति द्वारा मनुष्य अमृतमयी नाम का यश गायन करता है।

62साधुओं की संगति द्वारा मनुष्य की समस्त स्थानों पर पहुँच हो जाती है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं