सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 270 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji

1अपने मुँह एवं जिव्हा से उसका यश सदैव बखान कर।

2जिसकी कृपा से तेरा धर्म कायम रहता है,

3हे मेरे मन ! तू हमेशा उस पारब्रह्म का ध्यान कर।

4पूज्य परमेश्वर की आराधना करने से तू उसके दरबार में शोभा प्राप्त करेगा।

5हे नानक ! इस तरह तुम प्रतिष्ठा सहित अपने धाम (परलोक) जाओगे॥ २॥

6हे मन ! जिसकी कृपा से तुझे सोने जैसा सुन्दर शरीर मिला है,

7उस प्रियतम राम से वृति लगा।

8जिसकी कृपा से तेरा पर्दा रहता है,

9उस प्रभु-परमेश्वर की स्तुति करने से तुम सुख प्राप्त कर लोगे।

10जिसकी कृपा से तेरे तमाम पाप छिप जाते हैं।

11हे मन ! उस प्रभु-परमेश्वर की शरण ले।

12जिसकी कृपा से कोई तेरे बराबर नहीं पहुँचता,

13हे मेरे मन ! अपने श्वास-श्वास से सर्वोपरि प्रभु को याद कर।

14जिसकी कृपा से तुझे दुर्लभ मनुष्य शरीर मिला है,

15हे नानक ! उस भगवान की भक्ति किया कर ॥ ३॥

16जिसकी कृपा से आभूषण पहने जाते हैं,

17हे मन ! उसकी आराधना करते हुए आलस्य क्यों किया जाए?

18जिसकी कृपा से तुम घोड़ों एवं हाथियों की सवारी करते हो,

19हे मन ! उस ईश्वर को कभी विस्मृत न कर।

20जिसकी कृपा से उद्यान, धरती एवं धन प्राप्त हुए हैं,

21उस ईश्वर को अपने मन में पिरोकर रख।

22हे मन ! जिस ईश्वर ने तेरी रचना की है,

23उठते-बैठते हर वक्त उसका ध्यान करते रहना चाहिए।

24हे नानक ! उस एक अदृश्य प्रभु का चिन्तन कर।

25वह लोक-परलोक दोनों में तेरी रक्षा करेगा ॥ ४ ॥

26जिसकी कृपा से तुम बड़ा दान-पुण्य करते हो,

27हे मन ! आठों पहर उसका ही ध्यान करना चाहिए।

28जिसकी कृपा से तू धार्मिक संस्कार एवं सांसारिक कर्म करता है,

29अपने श्वास-श्वास से उस प्रभु का चिन्तन करना चाहिए।

30जिसकी कृपा से तेरा सुन्दर रूप है,

31उस अनुपम प्रभु का हमेशा सिमरन करना चाहिए।

32जिसकी दया से तुझे उच्च (मनुष्य) जाति मिली है,

33सदा उस प्रभु का दिन-रात चिन्तन कर।

34जिसकी कृपा से तेरी प्रतिष्ठा बरकरार रही है,

35हे नानक ! गुरु की कृपा से उसकी महिमा किया कर ॥ ५ ॥

36जिसकी दया से तू कानों से शब्द सुनता है।

37जिसकी दया से तू आश्चर्यजनक कौतुक देखता है।

38जिसकी दया से तू अपनी जिव्हा से मीठे वचन बोलता है।

39जिसकी कृपा से तू सहज ही सुखपूर्वक रहता है।

40जिसकी दया से तेरे हाथ हिलते और काम करते हैं।

41जिसकी दया से तेरे सम्पूर्ण काम सफल होते हैं।

42जिसकी दया से तुझे परमगति मिलती है।

43जिसकी दया से तुम सहज सुख में लीन हो जाओगे,

44ऐसे प्रभु को छोड़कर तुम क्यों किसी दूसरे से लग रहे हो ?

45हे नानक ! गुरु की कृपा से अपने मन को ईश्वर की ओर जाग्रत कर ॥ ६॥

46जिसकी कृपा से तू दुनिया में लोकप्रिय हुआ है,

47उस प्रभु को कभी अपने ह्रदय से न भुला।

48जिसकी कृपा से तेरा तेज-प्रताप बना है,

49हे मेरे मूर्ख मन ! तू उसकी आराधना करता रह।

50जिसकी दया से तेरे समस्त कार्य सम्पूर्ण हुए हैं,

51अपने हृदय में उसको सदा निकट समझ।

52जिसकी दया से तुझे सत्य प्राप्त होता है,

53हे मेरे मन ! तू उससे प्रेम कर।

54जिसकी कृपा से सबकी गति हो जाती है,

55हे नानक ! उस प्रभु के नाम का एक रस जाप करना चाहिए ॥ ७ ॥

56वही पुरुष ईश्वर का नाम जपता है, जिससे वह स्वयं जपाता है।

57केवल वही ईश्वर का यशोगान करता है, जिससे वह स्वयं गुणगान करवाता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं