गुरु ग्रंथ साहिब 265 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji
1भगवान का नाम ही भक्त के लिए योग (साधन) एवं गृहस्थी का माया-भोग है।
2भगवान के नाम का जाप करने से उसे कोई दुःख-क्लेश नहीं होता।
3भगवान का भक्त उसके नाम की सेवा में ही मग्न रहता है।
4हे नानक ! (भक्त सदैव) प्रभुदेवा परमेश्वर की ही पूजा करता है॥ ६ ॥
5हरि-परमेश्वर का नाम भक्त के लिए धन का भण्डार है।
6हरि नाम रूपी धन प्रभु ने स्वयं अपने भक्त को दिया है।
7हरि-परमेश्वर का नाम उसके भक्त का सशक्त सहारा है।
8हरि के प्रताप से भक्तजन किसी दूसरे को नहीं जानता।
9ताने-बाने की भाँति प्रभु का भक्त हरि-रस में मग्न रहता है।
10शून्य समाधि में लीन वह नाम-रस में मस्त रहता है।
11भक्त दिन के आठ पहर हरि-परमेश्वर के नाम का ही जाप करता रहता है।
12हरि का भक्त दुनिया में लोकप्रिय हो जाता है, छिपा नहीं रहता।
13भगवान की भक्ति अनेकों को मोक्ष प्रदान करती है।
14हे नानक ! भक्तों की संगति में कितने ही भवसागर से पार हो जाते हैं॥ ७ ॥
15हरि का नाम ही कल्पवृक्ष है।
16हरि-परमेश्वर के नाम का यशोगान करना ही कामधेनु है।
17हरि की कथा सबसे उत्तम है।
18भगवान का नाम सुनने से दुःख-दर्द दूर हो जाते हैं।
19नाम की महिमा संतों के ह्रदय में निवास करती है।
20संतों के तेज प्रताप से समस्त पाप नाश हो जाते हैं।
21संतों की संगति सौभाग्य से ही प्राप्त होती है।
22संतों की सेवा से नाम-सिमरन किया जाता है।
23ईश्वर के नाम के तुल्य कोई दूसरा नहीं।
24हे नानक ! कोई विरला गुरमुख ही नाम को प्राप्त करता है॥ ८ ॥ २॥
25श्लोक ॥
26बहुत सारे शास्त्र एवं बहुत सारी स्मृतियाँ देखी हैं और उन सबकी (भलीभाँति) खोज की है।
27(लेकिन) यह ईश्वर के नाम की बराबरी नहीं कर सकते। हे नानक ! हरि-परमेश्वर का नाम अमूल्य है॥ १॥
28अष्टपदी ॥
29जप, तपस्या, समस्त ज्ञान एवं ध्यान,
30छ : शास्त्रों के ग्रंथ एवं स्मृतियों का बखान,
31योग का साधन एवं धार्मिक कर्म-काण्डों का करना,
32प्रत्येक वस्तु को त्याग देना एवं वन में भटकना,
33अनेक प्रकार के बहुत यत्न करे,
34दान-पुण्य, होम यज्ञ एवं अत्याधिक दान करना,
35शरीर को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटना एवं उनकी अग्नि में आहूति देना,
36अनेक प्रकार के व्रत एवं नियमों की पालना,
37लेकिन यह सभी राम के नाम की आराधना के तुल्य नहीं हैं।
38हे नानक ! (चाहे) यह नाम एक बार ही गुरु की शरण में जपा जाए॥ १॥
39इन्सान चाहे पृथ्वी के नौ खण्डों पर भ्रमण करे, चिरकाल (लम्बी आयु) तक जीता रहे,
40वह महा निर्वाण एवं तपस्वी हो जाए और
41अपने शरीर को अग्नि में होम कर दे,
42वह सोना, घोड़े एवं भूमिदान कर दें,
43वह निउली कर्म (योगासन का रूप) और बहुत सारे योगासन करें,
44वह जैनियों के मार्ग पर चलकर अत्यंत कठिन साधन तथा तपस्या करें,
45वह अपने शरीर को छोटा-छोटा करके कटना दे,
46तो भी उसके अहंकार की मैल दूर नहीं होती।
47भगवान के नाम के बराबर कोई वस्तु नहीं।
48हे नानक ! गुरु के माध्यम से भगवान के नाम का जाप करने से इन्सान को मुक्ति मिल जाती है।॥ २॥
49कुछ लोगों की मनोकामना होती है कि किसी तीर्थ-स्थान पर शरीर त्यागा जाए
50परन्तु (फिर भी) मनुष्य का अहंकार एवं अभिमान मन से दूर नहीं होते।
51चाहे मनुष्य दिन-रात पवित्रता करता है
52परन्तु मन की मैल उसके शरीर से दूर नहीं होती।
53चाहे मनुष्य अपने शरीर से बहुत संयम-साधना करता है,
54फिर भी माया के बुरे विकार उसके मन को नहीं त्यागते।
55चाहे मनुष्य इस नश्वर शरीर को कई बार पानी से साफ करता है,
56तो भी (यह शरीर रूपी) कच्ची दीवार कहीं पवित्र हो सकती हैं?
57हे मेरे मन ! हरि के नाम की महिमा बहुत ऊँची है।
58हे नानक ! (प्रभु के ) नाम से बहुत सारे पापी मुक्त हो गए हैं॥ ३॥
59अधिक चतुराई के कारण मनुष्य को मृत्यु का भय आ दबोचता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं