गुरु ग्रंथ साहिब 263 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji
1हे नानक ! मैं उन सिमरन करने वाले महापुरुषों के चरण-स्पर्श करता हूँ॥ ३॥
2प्रभु का सिमरन सबसे ऊँचा है।
3प्रभु का सिमरन करने से अनेक प्राणियों का उद्धार हो जाता है।
4प्रभु का सिमरन करने से तृष्णा मिट जाती है।
5प्रभु का सिमरन करने से सब कुछ सूझ जाता है।
6प्रभु का सिमरन करने से यम (मृत्यु) का भय निवृत हो जाता है।
7प्रभु का सिमरन करने से अभिलाषा पूरी हो जाती है।
8प्रभु का सिमरन करने से मन की मैल उतर जाती है
9और भगवान का अमृत नाम हृदय में समा जाता है।
10पूजनीय प्रभु अपने संत पुरुषों की रसना में निवास करते हैं।
11हे नानक ! मैं गुरमुखों के दासों का दास हूँ॥ ४॥
12जो प्रभु का सिमरन करते हैं, ऐसे व्यक्ति ही धनवान हैं।
13जो प्रभु का सिमरन करते हैं, वही व्यक्ति इज्जतदार हैं।
14जो लोग प्रभु को स्मरण करते हैं, वे प्रभु के दरबार में स्वीकृत होते हैं।
15जो व्यक्ति प्रभु का सिमरन करते हैं, वे जगत् में प्रसिद्ध हो जाते हैं।
16जो पुरुष प्रभु का सिमरन करते हैं, वे किसी के आश्रित नहीं रहते।
17जो प्राणी प्रभु का सिमरन करते हैं, वे सब के सम्राट हैं।
18जो प्राणी प्रभु को स्मरण करते हैं, वह सुख में निवास करते हैं।
19जो प्रभु को स्मरण करते हैं, वे अमर हो जाते हैं।
20जिन पर ईश्वर दयालु होता है, केवल वही व्यक्ति प्रभु का सिमरन करते हैं।
21हे नानक ! मैं प्रभु के सेवकों की चरणधूलि ही मांगता हूँ॥ ५॥
22जो व्यक्ति प्रभु का सिमरन करते हैं, ऐसे व्यक्ति परोपकारी बन जाते हैं।
23जो व्यक्ति प्रभु का सिमरन करते हैं, मैं उन पर हमेशा ही कुर्बान जाता हूँ।
24जो व्यक्ति प्रभु का सिमरन करते हैं, उनके मुख अति सुन्दर हैं।
25जो प्राणी प्रभु को स्मरण करते हैं, वह अपना जीवन सुखपूर्वक व्यतीत करते हैं।
26जो प्रभु का सिमरन करते हैं, वह अपने मन को जीत लेते हैं।
27जो प्राणी प्रभु को स्मरण करते हैं, उनका जीवन-आचरण पावन हो जाता है।
28जो प्रभु का सिमरन करते हैं, उन्हें अनेक खुशियाँ एवं हर्षोल्लास ही प्राप्त होते हैं।
29जो प्राणी प्रभु का सिमरन करते हैं, वह ईश्वर के निकट वास करते हैं।
30संतों की कृपा से वह रात-दिन जाग्रत रहते हैं।
31हे नानक ! प्रभु-सिमरन की देन भाग्य से ही प्राप्त होती है। ६॥
32प्रभु का सिमरन करने से समस्त कार्य सम्पूर्ण हो जाते हैं।
33प्रभु का सिमरन करने से प्राणी कभी चिन्ता-क्लेश के वश में नहीं पड़ता।
34प्रभु के सिमरन द्वारा मनुष्य भगवान की गुणस्तुति की वाणी करता है।
35प्रभु के सिमरन द्वारा मनुष्य सहज ही परमात्मा में लीन हो जाता है।
36प्रभु के सिमरन द्वारा वह अटल आसन प्राप्त कर लेता है।
37प्रभु के सिमरन द्वारा मनुष्य का हृदय कमल प्रफुल्लित हो जाता है।
38प्रभु के सिमरन द्वारा दिव्य भजन गूंजता है।
39प्रभु के सिमरन द्वारा सुख का कोई अन्त अथवा पार नहीं।
40जिन प्राणियों पर प्रभु की कृपा होती है, वह उसका सिमरन करते रहते हैं।
41हे नानक ! (कोई किस्मत वाला ही) उन प्रभु-स्मरण करने वालों की शरण लेता है॥ ७ ॥
42भगवान का सिमरन करके भक्त दुनिया में लोकप्रिय हो जाते हैं।
43भगवान के सिमरन में ही सम्मिलित होकर वेद (इत्यादि धार्मिक ग्रंथ) रचे गए।
44भगवान के सिमरन द्वारा ही मनुष्य सिद्ध, ब्रह्मचारी एवं दानवीर बन जाते हैं।
45भगवान के सिमरन द्वारा नीच पुरुष चारों दिशाओं में प्रसिद्ध हो गए।
46भगवान के सिमरन ने ही सारी धरती को धारण किया हुआ है।
47हे जिज्ञासु ! संसार के कर्ता परमेश्वर को सदा स्मरण करते रहो।
48प्रभु ने अपने सिमरन हेतु सृष्टि की रचना की है।
49जहाँ प्रभु का सिमरन होता है, उस स्थान पर स्वयं निरंकार विद्यमान है।
50हे नानक ! भगवान जिसे कृपा करके सिमरन की सूझ प्रदान करता है,
51गुरु के माध्यम से ऐसे व्यक्ति को भगवान के सिमरन की देन मिल जाती है॥ ८॥ १॥
52श्लोक ॥
53हे दीनों के दर्द एवं दुःख का नाश करने वाले प्रभु ! हे प्रत्येक शरीर में व्यापक स्वामी । हे अनाथों के नाथ परमात्मा !
54मैं तेरी शरण में आया हूँ, आप प्रभु मेरे (नानक के) साथ हो।॥ १॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं