सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 262 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji

1मुझे अपने नाम का दान प्रदान कीजिए चूंकि जो मैं इसे अपने हृदय में पिरोकर रखूं ॥ ५५॥

2श्लोक॥

3गुरु ही माता है, गुरु ही पिता है और गुरु ही जगत् का स्वामी परमेश्वर है।

4गुरु ही अज्ञानता का अँधेरा नाश करने वाला मित्र है। गुरु ही रिश्तेदार एवं भाई है।

5गुरु ही दाता एवं हरि नाम का उपदेशक है और गुरु ही मेरा अचूक मन्त्र है।

6गुरु सुख-शांति, सत्य एवं बुद्धि की मूर्ति है। गुरु ही ऐसा पारस है, जिसे स्पर्श करके प्राणी का भवसागर से उद्धार हो जाता है।

7गुरु ही तीर्थ एवं अमृत का सरोवर है। गुरु के ज्ञान में स्नान करने से मनुष्य अपरम्पार प्रभु को मिल जाता है।

8गुरु ही सृष्टिकर्ता एवं समूचे पापों का नाश करने वाले हैं और गुरु पतितों को पवित्र-पावन करने वाले हैं।

9जब से संसार की रचना हुई है, गुरु आदिकाल से ही हरेक युग में है। गुरु ईश्वर के नाम का मन्त्र है, जिसका जाप करने से प्राणी का उद्धार हो जाता है।

10हे प्रभु ! कृपा करके हमें गुरु की संगति प्रदान करो तांकि हम मूर्ख एवं पापी उसकी संगति में रहकर भवसागर से पार हो जाएँ।

11गुरु स्वयं ही पारब्रह्म एवं परमेश्वर है। हे नानक ! भगवान के रूप गुरु की वन्दना करनी चाहिए॥ १॥

12यह श्लोक शुरु से लेकर अंत तक पढ़ना है।

13गउड़ी सुखमनी मः ५ ॥

14सलोकु ॥

15ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

16मैं आदि गुरु को प्रणाम करता हूँ।

17मैं पहले युगों के गुरु को प्रणाम करता हूँ। |

18मैं सतिगुरु को प्रणाम करता हूँ।

19मैं श्री गुरुदेव जी को प्रणाम करता हूँ॥ १॥

20अष्टपदी।

21परमात्मा का नाम सिमरन करो और नाम-सिमरन करके सुख हासिल करो।

22इस तन में जो दुःख-क्लेश हैं, उन्हें मिटा लो।

23केवल, एक जगत् के पालनहार प्रभु के यश को स्मरण करो।

24असंख्य लोग प्रभु के अनेक नामों का जाप करते हैं।

25पवित्र अक्षर वाले वेद, पुराण एवं स्मृतियां

26प्रभु के नाम के एक अक्षर की रचना है।

27जिसके हृदय में राम का नाम थोड़ा-सा भी वास करता है,

28उसकी महिमा व्यक्त नहीं की जा सकती।

29हे प्रभु ! जो लोग तेरे दर्शनों के अभिलाषी हैं,

30उनकी संगति में रखकर मुझ नानक का भी उद्धार कर दो ॥ १॥

31सुखमनी प्रभु का सुख रूपी अमृत नाम है।

32जिसका भक्तजनों के मन में निवास होता है। रहाउ॥

33प्रभु को स्मरण करने से प्राणी गर्भ में नहीं आता।

34प्रभु को स्मरण करने से दुःख एवं मृत्यु का भय निवृत्त हो जाता है।

35प्रभु का सिमरन करने से काल भी दूर हो जाता है।

36प्रभु को स्मरण करने से शत्रु टल जाता है।

37प्रभु को स्मरण करने से कोई विध्न नहीं पड़ता।

38प्रभु को स्मरण करने से मनुष्य रात-दिन जाग्रत रहता है।

39प्रभु को स्मरण करने से भय प्रभावित नहीं करता।

40प्रभु को स्मरण करने से दुःख-क्लेश प्रभावित नहीं करता।

41ईश्वर को स्मरण करने से संतों की संगति प्राप्त होती है।

42हे नानक ! समस्त निधियाँ ईश्वर की प्रीति में है॥ २ ॥

43प्रभु के सिमरन में ऋद्धि, सिद्धि एवं नौ निधियाँ हैं।

44प्रभु के सिमरन से ही मनुष्य ज्ञान, ध्यान, दिव्यदृष्टि एवं बुद्धि का सार प्राप्त करता है।

45प्रभु के सिमरन में ही, जप, तपस्या एवं पूजा है।

46प्रभु को स्मरण करने से द्वेतभाव दूर हो जाता है।

47प्रभु को स्मरण करने से तीर्थ स्नान का फल प्राप्त हो जाता है।

48प्रभु को स्मरण करने से प्राणी उसके दरबार में मान-सम्मान प्राप्त कर लेता है।

49प्रभु को स्मरण करने से प्राणी उसकी इच्छा को मीठा (भला) मानता है।

50प्रभु को स्मरण करने से मनुष्य-जन्म का मनोरथ सफल हो जाता है।

51केवल वही जीव उसे स्मरण करते हैं, जिन्हें वह स्वयं स्मरण करवाता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं