सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 255 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji

1हे भगवान ! मुझ पर अपनी ऐसी कृपा कर दो ।

2मैंने अपनी अधिकतर बुद्धिमत्ता एवं चतुरता त्याग दी है

3और अपने मन को संतों के आसरे टिका दिया है।

4हे नानक ! यह देहि चाहे मिट्टी का पुतला है, वह वह परमगति प्राप्त कर लेता है,

5संत जिस व्यक्ति की मदद करते हैं ॥ २३॥

6श्लोक॥

7मासूम लोगों पर अत्याचार एवं जुल्म करके मनुष्य बड़ा ही अभिमान करता है और अपने नश्वर शरीर से पाप करता है।

8हे नानक ! ऐसा व्यक्ति अहंबुद्धि के कारण बंधनों में फंस जाता है लेकिन उस व्यक्ति की परमेश्वर के नाम से ही मुक्ति होती है॥ १॥

9पउड़ी॥

10ज - यदि कोई मनुष्य यह सोचता है कि मैं कुछ बन गया हूँ,

11वह इस अभिमान में यूं फंस जाता है जिस तरह कोई तोता (दाने के) भ्रम में कमलिनी के साथ फँस जाता है।

12यदि कोई व्यक्ति अपने आपको भक्त एवं ज्ञानी समझता है

13तो परलोक में प्रभु उसको थोड़ा-सा भी सम्मान नहीं देता।

14यदि कोई व्यक्ति अपने आपको धार्मिक प्रचारक समझाता है

15तो वह फेरी वाले व्यापारी की भाँति धरती पर भटकता रहता है।

16हे नानक ! जो व्यक्ति संतों को संगति में अपने अहंकार का नाश कर देता है,

17उसे मुरारी प्रभु मिल जाता है।॥ २४ ॥

18श्लोक ॥

19नानक का कथन है कि (हे जीव !) प्रातःकाल उठकर ईश्वर का नाम जप और रात-दिन उसकी आराधना कर।

20फिर तुझे कोई चिन्ता फिक्र प्रभावित नहीं करेगी और मुसीबत लुप्त हो जाएगी॥ १॥

21पउड़ी ॥

22झ - हे भाई तेरा पश्चाताप मिट जाएगा,

23अगर तू परमेश्वर के नाम का व्यापार करगा ।

24शाक्त मनुष्य बड़ी चिन्ता एवं दुःख से मर जाता है

25जिसके हृदय में मोह-माया की प्रीति है।

26हे मेरे मन ! तेरे समस्त पाप-विकार एवं दोष मिट जाएँगे

27जो तू संतों की संगति में अमृत कथा सुनें ।

28हे नानक ! उसके काम-क्रोध इत्यादि समूचे दुष्ट नाश हो जाते हैं

29जिस व्यक्ति पर परमात्मा कृपा कर देता है । २५ ॥

30श्लोक ॥

31हे मेरे मित्र ! चाहे तू अनेक प्रकार के उपाय कर ले, परन्तु दुनिया में सदा के लिए नहीं रह सकेगा।

32हे नानक ! यदि हरि-परमेश्वर का भजन करोगे और नाम से प्रेम करोगे तो सदा के लिए आत्मिक जीवन प्राप्त हो जाएगा ॥ १॥

33पउड़ी ॥

34ञ - यह बात निश्चित तौर पर समझ ले कि यह दुनिया का मोह नाश हो जाएगा। |

35चाहे मैं गणना करता रहूँ किन्तु मैं गिन नहीं सकता कि कितने प्राणी संसार त्याग कर चले गए हैं ?

36जिस किसी को भी मैं देखता हूँ, वह नाश होने वाला है। इसलिए मैं किससे संगति करूं ?

37इस प्रकार अपने मन में उचित समझ ले कि दुनिया के पदार्थों की प्रीति झूठी है।

38इस तथ्य को वहीं जानता है और वही संत है, जिसको प्रभु ने दुविधा से खाली किया है।

39हे ईश्वर ! जिस मनुष्य पर तुम सुप्रसन्न होते हो, उसे तुम अन्धे कुएँ से बाहर निकाल लेते हो।

40जिसका हाथ सामथ्र्य है, वह संसार के संयोग बनाने के योग्य है।

41हे नानक ! उस प्रभु की गुणस्तुति करते रहो, जो संयोग बनाने वाला है॥ २६॥

42श्लोक॥

43संतों की निष्काम सेवा करने से जन्म-मरण के चक्र मिट जाते हैं और सुख उपलब्ध हो जाता है।

44हे नानक ! गुणों का भण्डार गोविन्द-प्रभु उसके मन से कभी भी विस्मृत न हो ॥ १॥

45पउड़ी ॥

46ट - उस एक ईश्वर की सेवा करते रहो, जिसके दरबार से कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता।

47यदि प्रभु तेरे मन, शरीर, मुख एवं हृदय में बस जाए तो जो कुछ भी तुम चाहते हो, वही मिल जाएगा।

48जिन पर संत कृपा के घर में हैं, उन्हें भगवान की सेवा का मौका मिल जाता है।

49संतों की संगति में मनुष्य तभी निवास करता है, जब ईश्वर स्वयं दयाल होता है।

50मैंने अनेकों लोक ढूंढ लिए हैं परन्तु ईश्वर के नाम बिना सुख-शांति नहीं।

51जो व्यक्ति संतों की संगति में बसता है, यमदूत उससे दूर हट जाते हैं।

52हे नानक ! मैं बार-बार संतों पर कुर्बान जाता हूँ,

53जिनके द्वारा मेरे कई जन्मों के किए अशुभ कर्मों के पाप नाश हो गए हैं॥ २७ ॥

54श्लोक॥

55हे ईश्वर ! जिन पर तुम सुप्रसन्न हो जाते हो, उनके मार्ग में तेरे दर पर पहुँचते हुए कोई रुकावट नहीं आती।

56हे नानक ! वह पुरुष भाग्यशाली हैं, जिनको ईश्वर ने अपना बना लिया है॥ १॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं