सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 253 · Raag Gauree

1पउड़ी ॥

2य - अपनी दुर्बुद्धि एवं द्वैतवाद को जला दो।

3इनको त्याग कर सहज सुख में निद्रा करो।

4य - जाकर उन संतों की शरण में पड़ जाओ,

5जिनकी सहायता से भवसागर से पार हुआ जा सकता है।

6य - वह व्यक्ति बार-बार संसार में जन्म नहीं लेता जिस ने एक ईश्वर का नाम अपने मन में पिरो लिया है।

7य - पूर्ण गुरु के आश्रय से अनमोल मनुष्य जीवन व्यर्थ नहीं जाता।

8हे नानक ! जिसके हृदय में एक परमेश्वर ही विद्यमान है, वह आत्मिक सुख प्राप्त कर लेता है॥ १४॥

9श्लोक॥

10जो इस लोक एवं परलोक में जीव का मित्र है, वह उसके मन-तन में रहता है।

11हे नानक ! पूर्ण गुरु ने मुझे हमेशा प्रभु का भजन करने का उपदेश प्रदान किया है॥ १॥

12पउड़ी॥

13रात-दिन उसका सिमरन करो, जो अन्तिम समय में जीव का सहायक बनता है।

14मोह-माया का यह विष केवल चार अथवा छ : दिनों का ही है। सभी इसे छोड़कर चले जाते हैं।

15माता, पिता, पुत्र एवं पुत्री कोई भी किसी का संगी नहीं है।

16कोई भी इन्सान घर, पत्नी एवं अन्य पदार्थ कुछ भी साथ लेकर नहीं जाता।

17इसलिए ऐसा नाम-धन संचित करो जो कभी नाश नहीं होता

18और जो सम्मानपूर्वक अपने घर (परलोक) में जा सके।

19हे नानक ! जो लोग अपने जीवन में सत्संग में प्रभु का भजन गायन करते हैं,

20वह पुनः जन्म-मरण के चक्र में फँसकर इस संसार में नहीं आते॥ १५॥

21श्लोक॥

22यदि कोई व्यक्ति अति सुन्दर, कुलीन, चतुर एवं उच्चकोटि का ज्ञानी एवं धनवान हो तो भी

23हे नानक ! जिनके हृदय में भगवान की प्रीति नहीं है वे मृतक ही कहलाए जाएँगे ॥ १॥

24पउड़ी ॥

25ङ - कोई व्यक्ति शास्त्रों का ज्ञाता हो,

26वह (योगी की भाँति) श्वास अन्दर खींचने, बाहर निकालने एवं टिकाने का कर्म करता हो,

27वह ज्ञान (धार्मिक) चर्चा, मनन, तीर्थ यात्रा एवं स्नान करता हो,

28वह अपना भोजन स्वयं पकाता हो, किसी के साथ न लगता हो एवं जंगल में रहता हो,

29यदि उसके ह्रदय में प्रभु के नाम से प्रीति नहीं

30तो सब कुछ जो वह करता है, वह नाशवान है।

31हे नानक ! उससे उत्तम उस चंडाल को समझो,

32जिसके मन में गोपाल निवास करता है॥ १६॥

33श्लोक॥

34मनुष्य अपने किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार संसार के चारों कुण्ट एवं दसों दिशाओं में भटकता रहता है।

35हे नानक ! सुख-दुःख, मोक्ष एवं योनि (आवागमन) लिखी हुई किस्मत अनुसार ही मिलता है॥१॥

36पउड़ी॥

37क - परमात्मा स्वयं ही संयोग बनाने वाला है।

38कोई भी प्राणी विधाता के विधान को मिटा नहीं सकता।

39ऐसा कोई भी कार्य नहीं है जो उसे फिर से करना पड़े,

40परमात्मा कभी भूल नहीं करता।

41कुछ जीवों को वह स्वयं ही सन्मार्ग दिखा देता है।

42कुछ जीवों को वह भयानक जंगल में भटकाता रहता है।

43यह समूचा जगत्-खेल भगवान ने स्वयं ही रचा है।

44हे नानक ! जो कुछ भी प्रभु प्राणियों को देता है, वही उन्हें मिल जाता है॥ १७॥

45श्लोक ॥

46(प्रभु के खजाने को) मनुष्य खाते, खर्च करते और भोगते रहते हैं परन्तु प्रभु का खजाना कभी समाप्त नहीं होता।

47हे नानक ! हरि-परमेश्वर के नाम का अनेकों ही मनुष्य भजन करते रहते हैं, जो कि गणना से परे है॥ १ ॥

48पउड़ी॥

49ख - परमात्मा जो समस्त शक्तियों का स्वामी है, उसके घर में किसी वस्तु की कोई कमी नहीं।

50जो कुछ प्रभु ने देना है, वह देता जा रहा है। मनुष्य चाहे जहाँ मन करता है, वहाँ चलता रहे।

51नाम-धन भक्तों के पास खर्च करने के लिए भण्डार है। यह उनकी राशि-पूंजी है।

52सहनशीलता, नम्रता, आनंद एवं सहजता से वह गुणों के भण्डार प्रभु का जाप करते जाते हैं।

53परमेश्वर जिन पर कृपा करता है, वह आनंदपूर्वक जीवन का खेल खेलते हैं और सदैव प्रसन्न रहते हैं।

54जिनके ह्रदय घर में राम के नाम का पदार्थ है, वह सदैव ही धनवान एवं सुन्दर हैं।

55ईश्वर जिन पर कृपा-दृष्टि करता है, उनको न ही कोई कष्ट होता है, न ही कोई पीड़ा एवं दण्ड मिलता है।

56हे नानक ! जो प्रभु को भले लगते हैं, वह पूर्णतया सफल हो जाते हैं।॥ १८ ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं