गुरु ग्रंथ साहिब 183 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji
1जिसकी आराधना करने से डूबते हुए पत्थर अर्थात् पापी जीव भी भवसागर से पार हो जाते हैं। ३॥
2संतों की सभा को मैं सदैव नमन करता हूँ।
3हरि-परमेश्वर का नाम संतजनों के प्राणों का आधार है।
4हे नानक ! प्रभु ने मेरी प्रार्थना सुन ली है।
5संतों की कृपा से मुझे ईश्वर के नाम में निवास मिल गया है ॥४॥२१॥९०॥
6गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
7सतिगुरु के दर्शनों से तृष्णा की अग्नि बुझ गई है।
8सतिगुरु को मिलने से अहंकार मिट गया है।
9सतिगुरु की संगति में मन डाँवाडोल नहीं होता।
10गुरु के माध्यम से प्राणी अमृत वाणी का उच्चारण करता है॥ १॥
11जब से मेरा मन सत्य के प्रेम में मग्न हुआ है, तब से मुझे वह सत्य-प्रभु सारी दुनिया में निवास करता दिखाई देता है।
12गुरु के माध्यम से प्रभु को जानकर मेरा मन शीतल एवं शांत-स्थिर हो गया है। १॥ रहाउ॥
13संतों की कृपा से मनुष्य हरि का नाम स्मरण करता है।
14संतों के प्रसाद से मनुष्य हरि का यश कीर्तन करता है।
15संतों की दया से मनुष्य की समस्त पीड़ा दूर हो जाती है।
16संतों की कृपा से प्राणी (मोह-माया के) बंधनों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है। ॥२॥
17संतों की कृपा से मोह एवं भ्रम मिट गए हैं।
18संतों की चरण-धूलि में स्नान करने से सभी धर्म कर्मों का फल मिल जाता है।
19जब संत कृपालु हैं तो गोविन्द दयालु हो जाता है।
20मेरे यह प्राण संतों में निवास करते हैं। ॥३॥
21यदि मैं कृपा के भण्डार दयालु परमात्मा का चिन्तन करूं, तो ही मैं संतों की संगति में बैठ सकता हूँ।
22हे नानक ! जब प्रभु ने मुझ गुणहीन पर दया की
23तो मैंने संतो की सभा में नाम सिमरन किया है | ॥४॥२२॥९१॥
24गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
25मैं संतों की सभा में मिलकर भगवान का सिमरन करता हूँ।
26गुरु ने मुझे केवल नाम का ही मंत्र प्रदान किया है।
27अपना अहंकार त्याग कर मैं निर्वेर हो गया हूँ।
28दिन के आठ प्रहर गुरु के चरणों की पूजा करो ॥ १॥
29मेरी पराई दुष्ट बुद्धि तब नष्ट हो गई,
30जब से मैंने हरि का यश अपने कानों से सुना है ॥ १॥ रहाउ॥
31रक्षक प्रभु जो सहज सुख एवं आनन्द का भण्डार है,
32अन्ततः मेरी रक्षा करेगा।
33मेरे दुख-दर्द एवं भय-भ्रम नाश हो गए हैं।
34प्रभु ने कृपा करके जन्म-मृत्यु के आवागमन से मेरी रक्षा की है। ॥२॥
35प्रभु स्वयं ही सब कुछ देखता, बोलता एवं सुनता है।
36हे मेरे मन ! उस प्रभु का सदैव ही सिमरन कर, जो सदैव तेरे साथ रहता है।
37संतों की कृपा से मेरे मन में प्रभु-ज्योति का प्रकाश हो गया है।
38गुणों का भण्डार एक ईश्वर सर्वत्र व्यापक हो रहा है। ॥३ ॥
39वे सभी पवित्र-पावन हो जाते हैं, जो मुख से उसकी महिमा करते एवं सुनते रहते हैं, और सदैव ही गोविन्द की महिमा-स्तुति करते रहते हैं,
40हे नानक ! जिस पर ईश्वर कृपालु हो जाता है,
41उस प्राणी की नाम-साधना सम्पूर्ण हो जाती है ॥४॥२३॥९२॥
42गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
43सतिगुरु मोह-माया के बन्धन तोड़कर मनुष्य से राम का सिमरन करवाता है।
44उस व्यक्ति के मन में सत्य-परमेश्वर का ध्यान लग जाता है। उसके क्लेश मिट जाते हैं और वह मनुष्य सुखपूर्वक रहता है।
45ऐसे दाता को ही सतिगुरु कहा जाता है। १॥
46केवल वही सुखदाता है, जो प्राणी से प्रभु के नाम का जाप करवाता है
47और कृपा करके उसके साथ मिला देता है॥ १॥ रहाउ॥
48जिस व्यक्ति पर परमात्मा दयालु हो जाता है, उसको वह गुरु से मिला देता है।
49समस्त भण्डार सर्वनिधि वह गुरु द्वारा प्राप्त कर लेता है।
50जो व्यक्ति अपना अहंकार त्याग देता है, उसका जन्म-मरण का चक्र मिट जाता है।
51वह संतों की संगति करके पारब्रह्म को पहचान लेता है॥ २॥
52अपने सेवक पर प्रभु दयालु हो गया है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं