गुरु ग्रंथ साहिब 1429 · Salok Mehl 9 · Guru Tegh Bahaadur Ji
1दुनिया को मैंने अपना बनाकर भी देख लिया है, परन्तु कोई किसी का (हमदद) नहीं।
2नानक का कथन है कि केवल प्रभु-भक्ति ही स्थिर है, इसे ही दिल में बसाए रखो ॥ ४८॥
3हे मित्र ! यह सच्चाई मान लो, कि यह जगत-रचना सब झूठ है।
4नानक का कथन है कि रेत की दीवार की तरह कुछ भी स्थिर नहीं रहता ॥ ४६ ॥
5दशरथ-सुत राम भी संसार को छोड़ गए, लंकापति रावण भी मौत की आगोश में चला गया, जिसका बहुत बड़ा परिवार था।
6नानक का कथन है कि यह संसार सपने की तरह है और कोई स्थाई नहीं है ॥ ५०॥
7चिंता तो उसकी करनी चाहिए, जो अनहोनी हो।
8हे नानक ! इस संसार मार्ग पर कोई स्थिर नहीं ॥ ५१॥
9जो भी जन्म लेता है, वह मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। आज अथवा कल हर कोई जाने वाला है।
10अतः नानक का मत है कि सब जंजाल छोड़कर भगवान का गुणगान कर लो ॥ ५२ ॥
11दोहा ॥
12हमारा बल खत्म हो गया है, बन्धनों में पड़े हुए हैं और कोई उपाय भी सिद्ध नहीं हो रहा।
13नानक फुरमाते हैं कि अब तो ईश्वर का ही हमें आसरा है, जैसे हाथी को घड़ियाल से बचाने के लिए सहायता की थी ॥५३ ॥
14ईश्वर में निष्ठा रखते हुए उत्तर हैआध्यात्मिक बल भी पुनः मिल जाता है, बन्धनों से छुटकारा हो जाता है, सब उपाय साकार हो जाते हैं।
15हे नानक ! सब कुछ आपके हाथ में हैं, आप स्वयं ही सहायता कर सकते हो ॥५४॥
16हमारे संगी-साथी सब छोड़ गए हैं। कोई आखिर तक साथ नहीं निभा सका।
17नानक विनती करते हैं कि हे परमेश्वर ! इस विपत्ति के समय एकमात्र तुम्हारा ही आसरा है॥ ५५ ॥
18हरिनाम एवं साधु स्थाई हैं, गुंरु परमेश्वर सदैव स्थिर है।
19हे नानक ! इस जगत में किसी विरले ने ही गुरुमंत्र का जाप किया है॥५६॥
20राम नाम दिल में बसा लिया है, जिसके बराबर कोई नहीं।
21जिसका स्मरण करने से संकट दूर जाते हैं और हरि के दर्शन हो जाते हैं ॥ ५७ ॥१॥
22थाल में तीन वस्तुएँ परोसी हुई हैं- सत्य, संतोष एवं विचार।
23इस में ठाकुर जी का अमृतमय नाम भी डाला हुआ है, जिसका सब लोगों को आसरा है।
24जो इस भोजन का सेवन करता, इसका भोग करता है, उसका उद्धार हो जाता है।
25इस अमृतमय नाम वस्तु को छोड़ा नहीं जा सकता, नित्य इसे दिल में धारण करो।
26इस अंधकार भरे संसार को हरि-चरणों में लगकर पार किया जा सकता है।
27गुरु नानक फुरमान करते हैं कि सब ओर ब्रह्म का ही प्रसार है॥१॥
28श्लोक महला ५॥
29हे परमपिता ! तेरे एहसानों को मैं समझ नहीं पाया, तुमने ही मुझे प्रतिभाशाली बनाया है।
30क्योंकि मुझ गुणविहीन में कोई गुण नहीं था, तुमने स्वयं ही मुझ पर तरस किया है।
31तुमने तरस किया, तेरी मेहरबानी हुई तो मुझे सज्जन सतिगुरु मिल गया।
32गुरु नानक का कथन है कि प्रभु-नाम पर ही मेरा जीवन निर्भर है, अतः नाम मिलने पर ही जीता हूँ, जिससे मेरा तन मन खिल उठता है॥१॥
33वह अद्वितीय परब्रहा जिसका वाचक ओम् है, केवल एक (ऑकार-स्वरूप) है, गुरु की कृपा से प्राप्त होता है।
34राग माला ॥
35एक राग के संग उसकी पाँच रागिनियाँ हैं,
36राग के आठ पुत्र भी साथ ही गाते हैं।
37रागी संगीतकार प्रथम राग भैरब को मानते हैं,
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं