सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1357 · Salok Sehskritee · Guru Arjan Dev Ji

1नानक का कथन है कि साधु पुरुषों के साथ परमात्मा का कीर्तन करो, यमदूत दृष्टि भी नहीं करते॥ ३४॥

2न ही धन-दौलत दुर्लभ है, न ही रूप-सौन्दर्य दुर्लभ है तथा स्वर्ग का शासन भी दुर्लभ नहीं।

3विभिन्न व्यंजनों वाला भोजन भी दुर्लभ नहीं और न ही स्वच्छ वस्त्र दुर्लभ हैं।

4पुत्र, मित्र, भाई, रिश्तेदार भी दुर्लभ नहीं और न ही पत्नी के साथ भोग-विलास दुर्लभ है।

5विद्या में निपुण होना भी दुर्लभ नहीं। अगर कोई चतुर-चालाक कहा जाए तो वह भी दुर्लभ नहीं।

6गुरु नानक फुरमान करते हैं- केवल भगवान का नाम कीर्तन ही दुर्लभ है और नाम सिर्फ साधुओं की संगत में प्रभु-कृपा से ही प्राप्त होता है॥ ३५॥

7स्वर्गलोक, मृत्युलोक, पाताललोक जहाँ भी दृष्टि जाती है, ईश्वर ही दृष्टिगत होता है।

8नानक का फुरमान है कि परमेश्वर सर्वत्र व्याप्त है, वह कर्म दोषों, पाप-पुण्यों से रहित है॥ ३६॥

9ईश्वर कृपा कर दे तो जहर भी अमृत हो जाता है, दुष्ट शत्रु भी सज्जन सखा बन जाते हैं।

10दुख सुखों में बदल जाता है और डरपोक मनुष्य भी निडर हो जाता है।

11स्थान विहीन को सुख का स्थान मिल जाता है। हे नानक ! परमात्मा की कृपा से नाम-कीर्तन से सर्व सुख प्राप्त होते हैं।॥ ३७॥

12सर्वशील प्रभु ही मुझे शील प्रदान करता है। वह सर्व पावन ही मुझे पावन करता है।

13सब कार्य करने वाला ही मेरा कर्ता है। हे नानक ! वह पाप-दोषों से सदा मुक्त है॥ ३८॥

14न ही चन्द्र देव इतने शीतल हैं, न ही बावन चन्दन शीतल है।

15हे नानक ! शरद ऋतु भी इतनी शीतल नहीं है, जितना साधु-महात्मा शीतल हैं॥ ३६॥

16साधु महापुरुषों का मंत्र केवल राम नाम जपना है, उनका ध्यान यही है कि ईश्वर सृष्टि के कण-कण में मौजूद है।

17सुख-दुख को एक समान मानना ही उनका ज्ञान है और उनकी जीवन-युक्ति पूरे संसार के साथ प्रेम करना है।

18वे सब जीवों पर दयालु रहते हैं और कामादिक पाँच दोषों को विवर्जित करते हैं।

19भगवान का भजन-कीर्तन ही उनका भोजन है और वे माया से यूं निर्लिप्त रहते हैं, जिस प्रकार जल में कमल रहता है।

20कोई मित्र हो अथवा शत्रु, वे सब को समान उपदेश देते हैं और भगवान की भक्ति ही उनको प्यारी लगती है।

21वे अपने कानों से पराई निन्दा नहीं सुनते और अहम्-भाव छोड़कर सबकी चरणरज बने रहते हैं।

22गुरु नानक फुरमान करते हैं- पूर्ण पुरुषों में यही छः लक्षण होते हैं और इनका नाम ही साधु महापुरुष कहलाता है॥ ४०॥

23चाहे बकरी कंदमूल खाती हुई शेर के समीप ही रहती है, फिर भी उसे मौत का डर बना रहता है।

24गुरु नानक फुरमान करते हैं कि यही हाल संसार के लोगों का है, जिनको खुशियों के साथ-साथ गम भी मिलता है॥ ४१॥

25मनुष्य लोगों को धोखा देता है, करोड़ों विध्न पैदा करता है, पाप-अपराधों की मैल में फंस जाता है।

26वह भ्रम, मोह, मान-अपमान, माया के नशे में लिप्त रहता है।

27जीवन-मृत्यु के चक्र में नरक भोगता है, परन्तु अनेक उपायों द्वारा भी बन्धनों से मुक्त नहीं होता।

28हे नानक ! साधु पुरुषों के साथ परमात्मा का नाम जपने से ही जीवन निर्मल होता है,

29अतः प्रतिदिन ईश्वर का गुणानुवाद करो॥ ४२॥

30परमेश्वर की शरण में मुक्ति संभव है, वह शीलवान है, लीला करने वाला है।

31वह सब करने-करवाने में समर्थ है और पूर्ण प्रभु सबको देने वाला है।

32वह निराश लोगों की आशा पूरी करता है और सर्व सुख पदार्थों का घर है।

33हे नानक ! संसार उस गुणों के भण्डार का सिमरन करता है और सभी विनयपूर्वक उसी से मांगते हैं।॥ ४३॥

34दुर्गम स्थान भी सुगम हो जाते हैं, बड़े से बड़े दुख सब सुखों में तबदील हो जाते हैं।

35दुर्वचन, भेद, मतावलंबी एवं चुगलखोर भी नेक एवं सज्जन बन जाते हैं।

36गम खुशियों में बदल जाता है और डरपोक व्यक्ति निडर बन जाता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं