गुरु ग्रंथ साहिब 1356 · Salok Sehskritee · Guru Arjan Dev Ji
1वह परब्रह्म परमेश्वर घट घट में बसा हुआ है।
2नानक विनयपूर्वक कामना करते हैं कि हे कृपानिधि नारायण ! ऐसी कृपा करो कि हम तुझे कभी विस्मृत न करें ॥२१॥
3हे परम पुरुषोत्तम ! न ही मुझ में कोई योग्यता है, न ही तेरी भक्ति की है औरं न ही तुझसे प्रीति लगाई है।
4नानक विनती करते हैं कि हे परमेश्वर ! तेरी कृपा से ही हम तेरा नाम-स्मरण करते हैं, तू कृपा का घर है।॥२२॥
5जन्मदाता ईश्वर सब जीवों का भरण-पोषण करता है, वह हमारे रहने के लिए मकान, कपड़े इत्यादि अनेक सुविधाएँ देता है।
6उसने अमूल्य मानव जन्म देकर चतुर एवं बुद्धिमान बनाया है।
7उसकी कृपा से हम आनंदपूर्ण एवं सुखी रहते हैं।
8गुरु नानक कथन करते हैं- जो ईश्वर का स्मरण करते हैं,
9वे नाशवान् रचना के मोह से बचे रहते हैं।॥ २३॥
10बड़े-बड़े शासक पूर्व जन्म में किए पुण्य कर्म का फल भोगते हैं।
11हे नानक ! मृत्युलोक में विपरीत बुद्धि वाले लम्बे समय तक दुख भोगते हैं।॥ २४॥
12जिनके दिल में ईश्वर का भजन-सिमरन होता है, वे दिल के दर्द को भी उसकी कृपा ही मानते हैं।
13परन्तु जिनको करुणामय परमेश्वर भूल जाता है, वे स्वस्थ होते हुए भी महारोगी हैं।॥ २५॥
14मनुष्य का धर्म केवल परमात्मा का कीर्तिगान करना है।
15हे नानक ! संतजन चाहे जितना भी नारायण के अमृतमय नाम का पान करते रहें, परन्तु वे तृप्त नहीं होते॥ २६॥
16संतजन सहनशील हैं, वे मित्रों एवं शत्रुओं को एक समान ही मानते हैं।
17हे नानक ! बेशक कोई अनेक प्रकार का भोजन लेकर आए, कोई निन्दा करे, चाहे कोई मारने के लिए आ जाए, वे सबको एक समान ही देखते हैं॥ २७॥
18उनका न ही तिरस्कार होता है, न ही कभी मान-सम्मान भंग होता है।
19न ही वे शोभाहीन होते हैं और न ही संसार के दुख उनको प्रभावित करते हैं।
20नानक वचन करते हैं कि साधु पुरुषों के साथ मिलकर ईश्वर का नाम जपने वाले ऐसे प्राणी सदा सुखी रहते हैं।॥ २८॥
21साधु मण्डली अजय शूरवीरों की सेना है, जिन्होंने तन पर नम्रता का कवच धारण किया हुआ है।
22ईश्वर का कीर्तिगान ही उनके शस्त्र हैं और शब्द-गुरु की ओट उनके हाथ की ढाल है।
23प्रभु मार्ग का परिचय ही उनके लिए हाथी, घोड़ों एवं रथों की सवारी है।
24वे निर्भय होकर रहते हैं और ईश्वर का कीर्तन करते हुए कामादिक शत्रु सेना पर आक्रमण करते हैं।
25हे नानक ! ऐसे महारथी काम, क्रोध रूपी पाँच लुटेरों को वश में करके पूरे विश्व को विजय कर लेते हैं।॥ २६॥
26दुर्बुद्धि वाला मनुष्य मृगतृष्णा, गंधर्व नगरी एवं पेड़ की छाया समान जीवन रचता है।
27इसी तरह परिवार का मोह भी झूठा है अतः नानक का उपदेश है कि राम नाम का सिमरन करते रहो॥ ३०॥
28व्यक्ति के पास न ही वेद-विद्या का भण्डार है, न ही वह गुणज्ञ है, न तो वह नाम-संकीर्तन में लीन होता है।
29न ही उसका कठ संगीत के योग्य है, और तो और वह चतुर एवं बुद्धिमान भी नहीं माना जाता।
30हे नानक ! यह सब उपलब्धि केवल उत्तम भाग्य से ही होती है और साधु पुरुषों की संगत में मूर्ख जीव भी पण्डित बन जाता है॥ ३१॥
31जिसके कण्ठ में राम नाम जपने की सुन्दर माला होती है, प्रेम धारण करना गोमुखी होता है।
32जिह्म से जो उत्तम श्लोक उच्चारण करता है, ऐसा व्यक्ति आँखों को सुख देने वाली माया से मुक्त हो जाता है॥ ३२॥
33जो प्राणी गुरु के मंत्र से विहीन रहते हैं, उनका जन्म धिक्कार योग्य एवं भ्रष्ट है।
34ऐसे मूर्ख तो असल में कुत्ते, सूअर, गधे, कौए एवं साँप समान हैं।॥ ३३॥
35हे सज्जनो,ईश्वर के चरणों का भजन करो, हृदय में हरिनाम धारण करो।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं