सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1355 · Salok Sehskritee · Guru Arjan Dev Ji

1राज्य प्राप्त होता है तो मान भी घर कर लेता है। अभिमान के कारण अनादर भी प्राप्त होता है।

2दरअसल दुनियादारी में सब नाशवान है।

3साधु पुरुषों के साथ परमात्मा का भजन ही स्थाई है, अतः नानक का फुरमान है कि भगवान के भजन में लीन रहो॥ १२॥

4जब भगवान अपनी कृपा कर देता है तो तत्व ज्ञान प्राप्त हो जाता है,

5बुद्धि का विकास होता है और सुख-शान्ति का स्थान प्राप्त होता है।

6इन्द्रियाँ वश में आ जाती हैं और अभिमान का त्याग होता है।

7संत-महात्मा पुरुषों से ज्ञान पा कर हृदय शीतल हो जाता है और

8हरि-दर्शन में लीन रहकर जन्म-मरण से मुक्ति हो जाती है।

9गुरु नानक फुरमाते हैं- फिर अन्तर्मन में शब्द की वीणा ही बजती रहती है॥ १३॥

10गुणवान् पुरुष वेदों की व्याख्या करते हैं, जिनको जिज्ञासु अनेक प्रकार से श्रवण करते हैं।

11लेकिन जिस पर परमात्मा की कृपा होती है, वही उत्तम विद्या पाते हैं।

12हे नानक ! वे नाम दान की कामना करते हैं, जिसे गुरु-परमेश्वर ही देने वाला है॥ १४॥

13माता-पिता, भाई की चिंता मत करो, न ही अन्य रिश्तेदारों की चिन्ता करो।

14पत्नी, पुत्र एवं दोस्तों की भी चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं, दरअसल ये दुनियादारी के संबंध मात्र माया के कारण हैं।

15नानक का फुरमान है कि भगवान इतना दयालु है कि वह सब जीवों को रोज़ी-रोटी देकर पोषण कर रहा है॥ १५॥

16धन-दौलत सदा नहीं रहती, मन की ख्वाहिशें अस्थाई हैं और अनेक प्रकार की कामनाएँ भी अल्पकालिक हैं।

17अहंकार के बन्धन में किया गया प्रेम, माया का भ्रम एवं मलिन विकार नाशवान हैं।

18खोटी बुद्धि वाला मनुष्य जठराग्नि में पड़कर अनेक योनियों में घूमता है, लेकिन ईश्वर का सुमिरन (स्मरण) नहीं करता।

19नानक विनती करते हैं कि हे गोविन्द ! कृपा करो, साधु पुरुषों की संगत में पतित-पापी जीवों का उद्धार कर दो॥ १६॥

20मनुष्य बेशक पहाड़ से गिर जाए, पाताल में चला जाए, भड़कती हुई आग में जलता रहे।

21चाहे वह पानी की तरंगों में बहता हुआ कितना ही दुखी क्यों न हो परन्तु घर की चिन्ता इन सबसे दुखदायक है, यही जन्म-मरण का कारण है।

22अनेक साधनों का उपयोग करने पर भी घर की परेशानियां दूर नहीं होती।अतः नानक का जनमानस को फुरमान है कि साधु-महापुरुषों का वचन (हरिनाम) ही आसरा देने वाला है॥ १७॥

23चाहे घोर दुःख - मुसीबते बानी हो अनेक जुर्म किये हों, जन्म जन्मांतर की गरीबी अथवा पाप-संकट से घिरे हुए हों।

24गुरु नानक फुरमान करते हैं- ईश्वर के भजन-सिमरन से ये सब यू मिट जाते हैं, जैसे अग्नि लकड़ियों को जलाकर राख कर देती हैं॥ १८॥

25परमात्मा का स्मरण करने से अंधेरे में भी उजाला हो जाता है, पापों का अन्त होता है, जीव गुणवान बन जाता है।

26जब भगवान हृदय में बस जाता है तो यमदूत भी डरने लगते हैं, शुभ कर्मो से मन पवित्र हो जाता है।

27हरि-कीर्तन सुनने से जीव जन्म-मरण के बन्धनों से मुक्त हो जाता है। ईश्वर के अमोघ दर्शनों से सर्व सुख प्राप्त होते हैं।

28भक्तों का प्यारा प्रभु शरण देने मे समर्थ है, गुरु नानक फुरमान करते हैं- भगवान हर सुख-कल्याण प्रदान करने वाला है॥ १६॥

29वह स्रष्टा पीछे रहने वाले (नाकामयाब) लोगों को सफलता की बुलंदी पर पहुँचा देता है और निराश व्यक्तियों की हर आशा पूरी कर देता है।

30उसकी रज़ा हो तो वह निर्धनों को धनवान् बना देता है और रोगियों के असाध्य रोग भी नष्ट कर देता है।

31वह भक्तों को भक्ति प्रदान करता है इस तरह भक्तजन राम नाम के गुणगान एवं कीर्तन में ही लीन रहते हैं।

32गुरु नानक फुरमाते हैं की परब्रह्म परमेश्वर इतना बड़ा दाता है, तो फिर उस गुरु की सेवा से क्या नहीं प्राप्त हो सकता॥ २०॥

33नारायण का नाम बेसहारा लोगों को सहारा देने वाला है, हरिनाम निर्धनों के लिए धन है।

34गोविन्द अनाथों का नाथ है, वह केशव बलहीन लोगों का बल है।

35वह पूरी दुनिया पर दया करने वाला है, अटल है, वही गरीबों का मसीहा है।

36वह परमपुरुष सर्वज्ञ है, भगवान अपने भक्तों से प्रेम करने वाला है एवं करुणामय है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं