गुरु ग्रंथ साहिब 1354 · Salok Sehskritee · Guru Arjan Dev Ji
1माता-पिता के साथ झूठा प्रेम धिक्कार योग्य है, भाइयों एवं रिश्तेदारों का प्रेम भी धिक्कार योग्य है।
2पत्नी से प्रेम एवं पुत्र के साथ खुशी भी धिक्कार योग्य है।
3गृहस्थी के साथ स्नेह धिक्कार है।
4नानक स्पष्ट करते हैं कि साधु पुरुषों के साथ सच्चा स्नेह बनाने से जीवन सुखी रहता है॥ २॥
5यह शरीर नाश होने वाला है, जिसका बल धीरे-धीरे खत्म हो जाता है।
6ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती है, माया से उतना ही मोह बढ़ता है।
7संसार में मनुष्य मेहमान की तरह है, लेकिन इसकी आशाओं में हरदम वृद्धि होती रहती है।
8भयानक यमराज जिन्दगी की सॉसें गिनता रहता है,
9यह दुर्लभ शरीर मोह के कूप में गिरा रहता है, गुरु नानक फुरमाते हैं- वहाँ भी ईश्वर का ही आसरा है।
10हे प्रभु ! हे जन्मदाता ! हे पालनहार ! हम पर अपनी कृपा बनाए रखो॥ ३॥
11यह शरीर रूपी कच्चा किला जल रूपी वीर्य का बना हुआ है, जिस पर रक्त एवं चमड़ी का लेपन किया गया है।
12आँखें, मुँह, कान इत्यादि इसके नौ द्वार हैं, जिनको कोई दीवार नहीं और प्राण-वायु का स्तंभ है।
13अज्ञानी लोग भगवान का स्मरण नहीं करते और शरीर को स्थाई मानते हैं।
14गुरु नानक फुरमाते हैं कि दुर्लभ शरीर का तभी उद्धार होता है,
15जब वे साधुओं की शरण में परमेश्वर का नाम जपते हैं॥ ४॥
16हे परमेश्वर ! तू पूरे विश्व में शोभायमान है, अटल है, गुणों का सागर है, सर्वव्यापक एवं कृपा का घर है।
17तू गहन-गंभीर, सबसे बड़ा, सर्वज्ञ एवं अपरंपार है।
18तू ही अपने भक्तों का प्यारा है, वे तेरे चरणों में ही सुख पाते हैं।
19नानक विनती करते हैं कि हे अनाथों के नाथ ! हम भी तेरी शरण में आए हैं॥ ५॥
20एक मृगनी को देखकर शिकारी अपने शस्त्र से प्रहार करता है।
21हे नानक ! जिसकी रक्षा ईश्वर करता है, उसका बाल भी बॉका नहीं हो पाता॥ ६॥
22यदि कोई व्यक्ति बहुत साहसी एवं बलवान हो, चारों दिशाओं से शूरवीर भी उसकी रक्षा कर रहे हों।
23चाहे वह बहुत ऊँचे स्थान पर रहता हो, जिसे मृत्यु का कोई खौफ न हो।
24गुरु नानक फुरमान करते हैं- जब भगवान की आज्ञा होती है तो एक छोटी-सी चींटी भी उसकी जान निकाल लेती है॥ ७॥
25कलियुग में यही उत्तम कर्म हैं कि प्रभु-शब्द में लीन रहना चाहिए,
26लोगों से प्रेम तथा दया करो और नित्य परमात्मा का कीर्तिगान करो।
27इससे भ्रम-मोह सब मिट जाते हैं और सर्वत्र भगवान ही दिखाई देता है।
28हे परमेश्वर ! तू सब पर कृपा-दृष्टि करने वाला है, तेरे दर्शन कल्याणकारी हैं और तू साधुओं की जिह्म पर बसता है,
29गुरु नानक का कथन है कि वे तो प्रिय हरिनाम ही जपते रहते हैं॥ ८॥
30सुन्दर रूप ध्वंस हो जाता है। द्वीप, सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र, गगन का भी अंत हो जाता है।
31धरती, पहाड़, वृक्ष, शिखर का भी विध्वंस हो जाता है।
32प्रिय पुत्र, पत्नी, भाई, शुभचिंतक सब नष्ट हो जाते हैं।
33सोना, चांदी, धन-दौलत, सुंदर रूप भी क्षीण होता है।
34केवल ईश्वर ही अटल है, जिसका कभी अन्त नहीं होता।
35हे नानक ! साधुजन भी स्थाई हैं।॥९ ॥
36हे मनुष्य ! धर्म करने में देरी मत करो, पाप न करो।
37लोभ छोड़कर हरिनाम में लीन रहो।
38संत-महात्मा जनों की शरण में सब पाप नाश हो जाते हैं,
39गुरु नानक फुरमान करते हैं- धर्म के गुण उसे ही प्राप्त होते हैं, जिस पर ईश्वर सुप्रसन्न होता है।॥ १०॥
40मंदबुद्धि जीव मोह-माया में ही लीन है और पत्नी के प्रेम व भोग-विलासों में रत रहता है।
41यह यौवन, सोने के आभूषणों की लालसा में रहता है।
42माया उसे इतना प्रभावित करती है कि यह सुन्दर घरों एवं शोभवान वस्त्रों में ही तल्लीन रहता है।
43नानक का कथन है कि हे अच्युत ! तू ही भक्तों को शरण देने वाला है। हे भगवान ! हमारा तुम्हे कोटि-कोटि प्रणाम है॥ ११॥
44जहाँ जन्म हुआ है तो मृत्यु भी निश्चित है। खुशियों मिल रही हैं तो गम भी मिलने हैं। अनेक पदार्थ भोग रहे हो तो रोग भी उत्पन्न होने हैं।
45कोई ऊँचा है तो नीचा भी हो जाता है, अगर थोड़ा है तो बहुत ज्यादा भी है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं