सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1135 · Raag Bhairao · Guru Raam Daas Ji

1दिल में परमात्मा का नाम जपो;

2शरीर रूपी नगरी में स्थित कामादिक पाँच लुटेरे गुरु-उपदेश से मारे जा सकते हैं।॥ १॥ रहाउ॥

3जिनका मन ईश्वर में ही रमा रहता है, वह उनके कार्य स्वयं संवार देता है।

4जिनको परमात्मा ने अंगीकार किया है, उनकी लोगों पर निर्भरता मिट गई है॥२॥

5सलाह-मशविरा तो किया जाए अगर प्रभु से कुछ बाहर हो।

6दिन-रात परमेश्वर का ध्यान करो; वह जो कुछ करेगा, वही भला होगा॥३॥

7जो कुछ परमात्मा करता है, वह स्वेच्छा से ही करता है और किसी से सलाह लेकर नहीं करता।

8हे नानक ! सो प्रभु का सदैव ध्यान करो, जिसने कृपा कर सतगुरु से साक्षात्कार करवाया है॥४॥ १॥ ५॥

9भैरउ महला ४॥

10हे स्वामी ! उन साधुगणों से भेंट करा दो, जिनका जाप करने से संसार के बन्धनों से हमारी मुक्ति हो जाए।

11उनके दर्शन पाकर मन प्रसन्न हो जाता है और पल-पल मैं उन पर बलिहारी हूँ॥१॥

12हृदय में प्रभु नाम का जाप करो;

13हे जगतपिता ! कृपा कर हमें अपने दासों के दास का पानी भरने वाला सेवक ही बना दो॥ १॥ रहाउ॥

14जिनके हृदय में परमेश्वर बस गया है, उनकी मति एवं प्रतिष्ठा भी अति उत्तम है।

15हे स्वामी ! उनकी सेवा में तल्लीन कर दो, चूंकि उनका स्मरण करने से हमारी मुक्ति हो सकती है॥२॥

16जिन्होंने ऐसा साधु सतगुरु नहीं पाया, उनको प्रभु-दरबार से निकाल दिया गया है।

17ऐसे निंदक पुरुष शोभा प्राप्त नहीं करते, उनको सृजनहार तिरस्कृत कर देता है॥३॥

18परमात्मा स्वयं ही (जीवों में) बुलवाता एवं बोलता है, परन्तु फिर भी वह माया की कालिमा से रहित, आकार रहित एवं सांसारिक पूर्तियों से भी निर्लिप्त है।

19नानक का कथन है कि हे परमेश्वर ! जिसे तू मिला लेता है, वह तुझ में ही विलीन रहता है, यह जीव बेचारा तो कुछ भी करने में असमर्थ है॥४॥२॥ ६॥

20भैरउ महला ४॥

21हे ईश्वर ! तेरी वही सत्संगति है, जहां भक्तजन हरि-कीर्तन सुनते हैं।

22जिसने हरिनाम का संकीर्तन सुना है, उसका मन आनंद-विभोर हो गया है और हम नित्य ही उसके चरणों के पूजक हैं।॥१॥

23संसार के जीवन ईश्वर का भजन करने से मुक्ति प्राप्त हो जाती है।

24हे परमेश्वर ! तेरे (अनेकानेक) असंख्य नाम हैं, इनको जीभ से गिना नहीं जा सकता॥१॥ रहाउ॥

25हे गुरु-शिष्यो ! हरिनाम बोलो, हरि के गुण गाओ और गुरु उपदेश लेकर हरि का जाप करो।

26जो गुरु का उपदेश सुनता है, वह परम सुख प्राप्त करता है॥२॥

27वह वंश धन्य है, वे माता-पिता भी धन्य एवं महान् हैं, जिन्होंने भक्त को पैदा किया है।

28जिसने श्वास-ग्रास से मेरे प्रभु का चिंतन किया है, ऐसे भक्त ने सच्चे दरबार में कीर्ति प्राप्त की है॥३॥

29परमेश्वर का नाम अगम्य है और उसने स्वयं ही भक्तों के अन्तर्मन में बसाया है।

30गुरु नानक फुरमान करते हैं- जिसने गुरु-उपदेशानुसार प्रभु का जाप किया है, वह संसार-सागर से पार हो गया है॥४॥३॥ ७॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं