सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 1133 · Raag Bhairao · Guru Amar Daas Ji

1नानक का कथन है कि वह गुरमुख को ही बड़ाई प्रदान करता है, इस तरह वह नाम में ही समा जाता है॥४॥ ६॥ १६॥

2भैरउ महला ३॥

3मेरी पट्टी पर हरिनाम लिख दो;

4हरि के सिवा किसी दूसरे से लगाव लगाना तो मौत के जाल में फँसने बराबर है।

5सतगुरु मेरी रक्षा करता है,

6वह सुखदाता ईश्वर मेरे साथ ही है॥१॥

7गुरु के उपदेश पर प्रहलाद ने हरिनाम उच्चरित किया और

8बालक दण्ड से बिल्कुल नहीं डरता॥१॥ रहाउ॥

9माता ने उपदेश दिया, प्यारे पुत्र प्रहलाद !

10राम नाम का जाप छोड़कर अपने प्राण बचा लो।

11प्रहलाद ने निर्भीक होकर कहा; हे मेरी माता !

12गुरु ने मुझे भेद समझा दिया है, अतः मैं राम नाम (का जाप) नहीं छोड़ सकता॥२॥

13प्रहलाद के अध्यापक शण्ड तथा अमरक ने राजा को शिकायत करते हुए आरोप लगाया कि

14प्रहलाद स्वयं तो बिगड़ा ही है, इसने अन्य सब विद्यार्थी भी बिगाड़ दिए हैं।

15दुष्ट राजा के दरबार में (प्रहलाद को मारने की) सलाह की गई,

16परन्तु ईश्वर स्वयं प्रहलाद का रखवाला बना॥३॥

17अहंकारी राजा हाथ में तलवार पकड़ (प्रहलाद की ओर) आया और

18क्रोधपूर्ण बोला, “कहाँ है तेरा परमात्मा, जो तुझे बचा लेगा?”

19तब पल में भयानक रूप नृसिंह खम्भा फोड़कर निकल आया और

20दुष्ट हिरण्यकशिपु को नाखुनों से फाड़कर भक्त प्रहलाद को बचा लिया॥४॥

21ईश्वर भक्तजनों के कार्य संवारता है और

22उसने भक्त प्रहलाद की इक्कीस कुलों का उद्धार किया।

23नानक फुरमाते हैं कि गुरु के उपदेश से अहम् रूपी जहर को समाप्त किया जाए तो

24राम नाम से भक्तों की मुक्ति हो जाती है।॥ ५॥ १०॥२०॥

25भैरउ महला ३॥

26(ईश्वर की यह लीला ही है कि) वह स्वयं ही दैत्यों को भक्तजनों के पीछे लगा देता है और फिर स्वयं ही उनकी रक्षा भी करता है।

27हे भक्तवत्सल ! जो सदा तेरी शरण में रहता है, उसके मन को कोई दुःख-दर्द प्रभावित नहीं करता॥१॥

28युग-युगांतर से परमात्मा अपने भक्तों की रक्षा करता आया है,

29दैत्य पुत्र प्रहलाद गायत्री तर्पण कुछ नहीं जानता था, पर शब्द की स्तुति से ही उसका मिलाप हुआ॥१॥ रहाउ॥

30जो रात-दिन भगवान की भक्ति करता है, शब्द द्वारा उसकी दुविधा निवृत्त हो जाती है।

31जो प्रभु की स्मृति में लीन रहता है, वह सदा निर्मल होता है और उसके मन में सच्चा प्रभु बसा रहता है।॥२॥

32मूर्ख व्यक्ति दुविधा में पड़ा रहता है, मूल को नहीं पहचानता, अतः उसका जीवन व्यर्थ ही जाता है।

33भक्तजनों की निंदा करने वालों ने दैत्य हिरण्यकशिपु को प्रहलाद के विरुद्ध उकसाया॥३॥

34भक्त प्रहलाद दुविधा में न पड़ा, हरिनाम का जाप उसने बिल्कुल नहीं छोड़ा और न ही किसी के डराने पर (मौत से) डरा।

35श्री हरि अपने भक्तजनों का रखवाला है, तभी दैत्य हिरण्यकशिपु का काल निकट आ गया॥४॥

36प्रभु अपनी भक्ति की लाज स्वयं रखता है और भक्तों को कीर्ति प्रदान करता है।

37हे नानक ! दुष्ट हिरण्यकशिपु का उसने नाखुनों से चीर कर वध कर दिया, पर अन्धे ने सच्चे द्वार को नहीं जाना॥ ५॥ ११॥२१॥

38रागु भैरउ महला ४ चउपदे घरु १

39ੴ सतिगुर प्रसादि॥

40अगर भक्तों व संतजनों की कृपा हो जाए तो वे प्रभु-चरणों में लगा देते हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं