सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1076 · Raag Maaroo · Guru Arjan Dev Ji

1नाम जपने वाला स्वयं तो पार होता ही है, अपनी समस्त वंशावलि का भी उद्धार करवाता है और वह सम्मानपूर्वक प्रभु-दरबार में जाता है॥ ६॥

2ये खण्ड, पाताल, द्वीप एवं सभी लोक

3प्रभु ने स्वयं ही सभी काल के वश में किए हुए हैं।

4एक निश्चल परमेश्वर स्वयं अविनाशी है और वही पुरुष निश्चल है, जो उसका चिंतन करता है॥ ७॥

5ईश्वर का उपासक ईश्वर-रूप जैसा ही होता है।

6मानव-शरीर में उसमें एवं भगवान में कोई भेद मत समझो;

7जैसे अनेक प्रकार की जल-तरंगें उठकर पुनः जल में ही विलीन हो जाती हैं, वैसे ईश्वर का उपासक पुनः उसमें ही समाहित हो जाता है॥ ८॥

8एक याचक प्रभु-द्वार पर दान माँगता है।

9यदि प्रभु को स्वीकार हो तो ही वह कृपा करता है।

10अपने दर्शन दीजिए, जिससे मन तृप्त हो जाए और हरि-कीर्तन में मन स्थिर होता है।॥ ९॥

11सुन्दर परमात्मा किसी भी प्रकार से मनुष्य के वश में नहीं आता,

12वह वही कुछ करता है, जो उसके संत-महापुरुषों को उपयुक्त लगता है।

13वे जो चाहते हैं, वही कुछ परमेश्वर से करवा लेते हैं, उनकी कही हुई बात अस्वीकार नहीं होती॥ १०॥

14हे प्राणी ! जहाँ कोई मुसीबत आ बनती है,

15वहाँ श्रीहरि का ध्यान करना चाहिए।

16जहाँ पुत्र, पत्नी एवं कोई साथी नहीं होता, वहाँ भगवान स्वयं ही उद्धारक होता है।॥ ११॥

17मालिक-प्रभु ही संसार में बड़ा है, अगम्य एवं असीम है,

18उस बेपरवाह प्रभु को कैसे मिला जा सकता है।

19जिस के बन्धन काटकर सच्चा मार्ग प्रदान करता है, वह तो सुसंगति में वास पाता है॥ १२॥

20जो उसके हुक्म का भेद बूझ लेता है, वास्तव में वही सेवक कहलाने का हकदार है।

21बुरा-भला वह दोनों को एक समान मानता है।

22जब अहम् दूर हो जाता है, वह एक परमेश्वर के रहस्य को बूझ जाता है और वह गुरुमुख सहजावस्था में ही सत्य में विलीन हो जाता है। १३॥

23भगवान के भक्त सदा सुखपूर्वक रहते हैं।

24वे बाल स्वभाव वाले भोले होते हैं, वासना से निर्लिप्त एवं विरक्त रहते हैं।

25वे विभिन्न प्रकार के अनेक रंग भोगते हैं, जैसे पिता अपने पुत्र से लाड लडाता है॥ १४॥

26अगम्य-अगोचर परमेश्वर की किसी ने भी सही कीमत नहीं ऑकी।

27उससे तभी मिला जाता है, जब वह स्वेछा से अपने संग मिला लेता है।

28गुरु के सान्निध्य में उस मनुष्य के हृदय में प्रभु प्रगट हो जाता है, जिनके माथे पर आरम्भ से ही भाग्य में लिखा है॥ १५॥

29हे ईश्वर ! तू ही कर्ता करने-करवाने वाला है,

30तूने ही समूची सृष्टि को उत्पन्न किया और धरती को स्थापित किया हुआ है।

31नानक तो परमात्मा के द्वार पर उसकी शरण में ही पड़ा है, यदि उसे स्वीकार हो तो वह स्वयं ही अपने दास की लाज रखता है।॥१६॥१॥५॥

32मारू सोलहे महला ५

33ੴ सतिगुर प्रसादि॥

34जो भी दृष्टिगोचर है, हे परमात्मा ! वह केवल तू ही है।

35तेरी ही वाणी कानों से सुनी जा रही है।

36तेरे सिया अन्य कोई वस्तु मालूम ही नहीं और यह सारी दुनिया तेरे सहारे पर ही कायम है॥ १॥

37अपने बनाए हुए संसार का तू स्वयं ही ध्यान रखता है।

38वह प्रभु स्वयं ही प्रकाशमान हुआ है।

39उसने स्वयं ही सगुण रूप उत्पन्न करके जगत्-रचना का प्रसार किया है और वह स्वयं ही घट-घट में व्याप्त होकर सबकी संभाल करता है॥ २॥

40उसने कई बड़े दरबार वाले बादशाह पैदा किए,

41कई उदासी साधु तो कई गृहस्थी पैदा किए।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं