गुरु ग्रंथ साहिब 9 · So Dar · Guru Nanak Dev Ji
1तुम्हारा गुणगान यति, सत्यवादी व संतोषी व्यक्ति भी कर रहे हैं और शूरवीर भी तुम्हारे गुणों की प्रशंसा कर रहे हैं।
2युगों-युगों तक वेदाध्ययन द्वारा विद्वान व ऋषि-मुनि आदि तुम्हारी कीर्ति को कहते हैं।
3मन को मोह लेने वाली स्त्रियाँ स्वर्ग, मृत्यु व पाताल लोक में तुम्हारा यशोगान कर रही हैं।
4तुम्हारे उत्पन्न किए हुए चौदह रत्न व संसार के अठसठ तीर्थ भी तुम्हारी स्तुति कर रहे हैं।
5योद्धा, महाबली व शूरवीर भी तुम्हारा यशोगान कर रहे हैं, चारों उत्पत्ति के स्रोत भी तुम्हारे यश को गा रहे हैं।
6नवखण्ड, द्वीप व ब्रह्माण्ड आदि के जीव भी तुम्हारा गान कर रहे हैं जो तुम ने रच-रच कर इस सृष्टि में स्थित कर रखे हैं।
7जो तुम्हें अच्छे लगते हैं व तेरे प्रेम में रत हैं वे भक्त ही तुम्हारा यशोगान करते हैं।
8और भी अनेकानेक तुम्हारा गुणगान कर रहे हैं, वे मेरे चिंतन में नहीं आ रहे हैं। श्री गुरु नानक देव जी कहते हैं कि मैं उनका क्या विचार करूँ।
9वह प्रभू सदा सच है उसकी महानता भी सदा बनी रहने वाली है।
10सत्य स्वरूप निरंकार भूतकाल में था और वह सत्य सम्मान वाला अब भी है। पुनः भविष्य में भी वही सत्य स्वरूप होगा, जिसने इस सृष्टि की रचना की है, वह न नष्ट होता है, न नष्ट होगा।
11अनेक प्रकार के रंगों की और विभिन्न तरह की माया द्वारा पशु-पक्षी आदि जीवों की जिसने रचना की है,
12वह सृजनहार परमात्मा अपने किए हुए प्रपंच को कर-करके अपनी इच्छानुसार ही देखता है।
13जो उसे भला लगता है वही करता है, पुनः उस पर आदेश करने वाला कोई भी नहीं है।
14हे नानक ! वह शाहों का शाह शहंशाह है, उसकी आज्ञा में रहना ही उचित है॥ १॥
15आसा महला १ ॥
16हे निरंकार स्वरूप ! (शास्त्रों व विद्वानों से) सुन कर तो प्रत्येक कोई तुझे बड़ा कहता है।
17किंतु कितना बड़ा है, यह तो तभी कोई बता सकता है यदि किसी ने तुझे देखा हो अथवा तुम्हारे दर्शन किए हों।
18वास्तव में उस सगुण स्वरूप परमात्मा की न तो कोई कीमत आंक सकता है और न ही उसका कोई अंत कह सकता है, क्योंकि वह अनन्त व असीम है।
19जिन्होंने तेरी गहिमा का अंत पाया है अर्थात् तेरे सच्चिदानन्द स्वरूप को जाना है वे तुझ में ही अभेद हो जाते हैं।॥ १॥
20हे मेरे अकाल पुरुष ! तुम सर्वोच्च हो, स्वभाव में स्थिर व गुणों के निधान हो।
21तुम्हारा कितना विस्तार है, इस तथ्य का ज्ञान किसी को भी नहीं है II १ II रहाउII
22समस्त ध्यान-मग्न होने वाले व्यक्तियों ने मिलकर अपनी वृत्ति लगाई।
23समस्त विद्वानों ने मिलकर तुम्हारा अन्त जानने की कोशिश की।
24शास्त्रवेता, प्राणायामी, गुरु व गुरुओं के भी गुरु
25तेरी महिमा का तिनका मात्र भी व्याख्यान नहीं कर सकते॥ २॥
26सभी शुभ-गुण, सभी तप और सभी शुभ कर्मः
27सिद्ध - पुरुषों की सिद्धि समान महानता;
28तुम्हारी कृपा के बिना पूर्वोक्त गुणों की जो सिद्धियाँ हैं वे किसी ने भी प्राप्त नहीं की।
29यदि परमेश्वर की कृपा से ये शुभ-गुण प्राप्त हो जाएँ तो फिर किसी के रोके रुक नहीं सकते॥ ३॥
30यदि कोई कहे कि हे अकाल-पुरुष ! मैं तुम्हारी महिमा कथन कर सकता हूँ तो यह बेचारा क्या कह सकता है।
31क्योकि हे परमेश्वर ! तेरी स्तुति के भण्डार तो वेदों, ग्रंथों व तेरे भक्तों के हृदय में भरे पड़े हैं।
32जिन को तुम अपनी स्तुति करने की बुद्धि प्रदान करते हो, उनके साथ किसी का क्या ज़ोर चल सकता है।
33गुरु नानक जी कहते हैं कि वह सत्यस्वरूप परमात्मा ही सबको शोभायमान करने वाला है II ४ II २ ॥
34आसा महला १ ॥
35हे माता जी ! जब तक मैं परमेश्वर का नाम सिमरन करता हूँ तब तक ही मैं जीवित रहता हूँ, जब मुझे यह नाम विस्मृत हो जाता है तो मैं स्वयं को मृत समझता हूँ ; अर्थात् मैं प्रभु के नाम में ही सुख अनुभव करता हूँ, वरन् मैं दुखी होता हूँ।
36किंतु यह सत्य नाम कथन करना बहुत कठिन है।
37यदि प्रभु के सत्य नाम की (भूख) चाहत हो
38तो वह चाहत ही समस्त दुखों को नष्ट कर देती है॥ १॥
39सो हे माता जी ! ऐसा नाम फिर मुझे विस्मृत क्यों हो।
40वह स्वामी सत्य है और उसका नाम भी सत्य है। ॥ १॥ रहाउ ॥
41परमात्मा के सत्य नाम की तिनका मात्र महिमाः
42(व्यासादि मुनि) कह कर थक गए हैं, किंतु वे उसके महत्व को नहीं जान पाए हैं।
43यदि सृष्टि के समस्त जीव मिलकर परमेश्वर की स्तुति करने लगें
44तो वह स्तुति करने से न बड़ा होता है और न निन्दा करने से घटता है॥ २ ॥
45वह निरंकार न तो कभी मरता है और न ही उसे कभी शोक होता है।
46वह संसार के जीवों को खान-पान देता रहता है जो कि उसके भण्डार में कभी भी समाप्त नहीं होता।
47दानेश्वर परमात्मा जैसा गुण सिर्फ उसी में ही है, अन्य किसी में नहीं।
48ऐसे परमेश्वर जैसा न पहले कभी हुआ है और न ही आगे कोई होगा ॥ ३॥
49जितना महान् परमात्मा स्वयं है उतनी ही महान उसकी बख्शिश है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं