गुरु ग्रंथ साहिब 999 · Raag Maaroo · Guru Arjan Dev Ji
1रजोगुणी (मनुष्य), सतोगुणी (देवते) एवं तमोगुणी (दैत्य) तथा अनेक रूप वाले उत्पन्न जीव परमात्मा के भय में विचरते है।
2जीवो से चल करने वाली बेचारी माया भी ईश्वर से भयभीत है और धर्मराज भी भय में विचरण कर रहा है। ३॥
3समूची जगत्-रचना उसके भय में है, मगर ईश्वर को कोई डर नहीं।
4हे नानक ! वह भक्तजनो का साथी है और भक्त उसके दरबार में ही शोभा के पात्र बनते है।॥४॥१॥
5मारू महला ५॥
6पाँच वर्ष का मासूम बालक ध्रुव ईश्वर का सिमरन करके अमर पद पा गया।
7अजामल ने पुत्र प्रेम के कारण मुँह से नारायण कहा तो ईश्वर ने यमदूतों को मार भगाकर उसका उद्धार किया॥ १।
8हे मेरे ठाकुर ! तूने कितने ही असंख्य जीवों का उद्धार कर दिया।
9मैं दीन, अल्पमति एवं गुणविहीन तेरी शरण में आया हूँ, मेरा कल्याण करो॥ १॥ रहाउ॥
10वाल्मीक को मोक्ष प्राप्त हुआ और बेचारे नीच शिकारी की मुक्ति हुई।
11एक पल हाथी ने मन में आराधना की तो ईश्वर ने मगरमच्छ से उसका छुटकारा किया | २॥
12दैत्य हिरण्यकशिपु को नखों से चीर कर नृसिंह भगवान् ने भक्त प्रहलाद की रक्षा की।
13दासी पुत्र विदुर को पावन कर दिया और उसकी समस्त वंशावलि उज्ज्वल कर दी॥ ३॥
14मैं अपने कौन-से अपराध बताऊँ, क्योंकि जीवन भर मिथ्या मोह में ही मग्न रहा।
15नानक कहते हैं कि हे हरि ! तेरा आसरा लेने के लिए मैं तेरी शरण में आया हैं, अपनी भुजा फैलाकर मुझे बचा लो॥ ४॥२॥
16मारू महला ५॥
17मैं धन के लिए बहुत भटकता रहा और अनेक यत्न करके भागदौड़ करता रहा।
18जितने भी कर्म अहम् में किए हैं, वे सब निष्फल हो चुके हैं॥ १॥
19जीवन के अन्य दिन किसी शुभ कर्म में नहीं लगाए,
20हे प्रभु जी ! मुझे वह दिन दीजिए, जिस दिन मैं तेरा यशगान करू॥ १॥ रहाउ॥
21जीवन भर अपने पुत्र, पत्नी एवं घर का प्रसार देखकर इसी में उलझा रहा।
22धन-दौलत का नशा चखकर इसमें ही मरत रहा परन्तु भगवान का कभी भजन नहीं किया॥ २॥
23मैंने अनेक प्रकार से नाम-स्मरण की युक्ति खोजी है परन्तु संतों के बिना प्राप्त नहीं होती।
24हे ईश्वर ! तू सबसे बड़ा दाता हैं, सर्वकला समर्थ है, मैं तुझसे ही माँगने के लिए आया हूँ॥ ३॥
25समूचा अभिमान एवं गर्व त्यागकर दास चरण-धूल समान तेरी शरण में आया है।
26हे नानक ! भगवान् से मिलकर एक महा आनंद एवं परमसुख उपलब्ध हुआ है॥ ४॥ ३॥
27मारू महला ५॥
28नाम-शोहरत किस जगह पर टिके हुए हैं, अहंकार कहाँ रहता है?
29मुँह से गाली सुनकर चेहरे पर कौन-सा जख्म पड़ गया है कि तू क्रोध से भर गया है ?॥ १॥
30अरे भाई ! सुनो; तू कौन है और कहाँ से आया है ?
31तू इतनी बात भी नहीं जानता कि यहाँ कब तक रहना है और तुझे यहाँ से चले जाने की खबर भी नहीं होनी॥ १॥ रहाउ॥
32पवन और पानी दोनों ही सहनशील हैं और पृथ्वी तो निःसंदेह क्षमावान् हैं।
33पाँच तत्वों से मिलकर तेरा शरीर बना है, बताओ, इन में क्या बुराई हैं ?॥२।
34जिस विधाता ने शरीर-रचना की है, उसने ही इसमें अभिमान भी डाल दिया है।
35जन्म-मरण का चक्र उस मनुष्य को ही हैं और वहीं आवागमन में पड़ा रहता है॥ ३॥
36यह समूचा जगत्त-प्रसार मिथ्या है और इस रचना का कोई भी रंग रूप व चिन्ह स्थिर नहीं है।
37नानक कहते हैं कि जब वह जगत् लीला को नष्ट कर देता हैं तो एक ओंकार का ही अस्तित्व रह जाता है॥ ४॥ ४॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं