गुरु ग्रंथ साहिब 996 · Raag Maaroo
1मारू महला ४ घरु ३
2ੴ सतिगुर प्रसादि॥
3गुरु के उपदेशानुसार जिसने हरि-नाम रूपी निधि प्राप्त की है, उसने ही यश हासिल किया है।
4लोक-परलोक में वही जीव का मददगार बनता है और अन्त में छुटकारा दिलवाता है।
5जहाँ संकीर्ण एवं कठिन गली-मार्ग है, वहाँ परमात्मा मुक्त करवाता है॥ १॥
6हे मेरे सतगुरु ! मुझे हरि-नाम दृढ़ करवा दो।
7हे माँ! हरि के बिना अन्य कोई भी मेरा माता-पिता, पुत्र एवं बंधु नहीं है॥ १॥ रहाउ॥
8हे माँ ! मैं ईश्वर का प्रेमी हूँ, कोई आकर मुझे उससे मिला दे।
9मैं उसके समक्ष प्रार्थना करता हूँ कि मुझे मेरे प्रियतम से मिला दे।
10महापुरुष सतगुरु बड़ा दयालु है, जो ईश्वर से मिलाप करवाने में कोई देरी नहीं करता॥ २॥
11जिन्होंने ईश्वर को याद नहीं किया, ऐसे भाग्यहीन मृत्यु का शिकार हो जाते हैं।
12वे बार-बार अनेक योनियों में भटकते हैं और आवागमन में पड़े रहते हैं।
13वे यम के द्वार पर कष्ट सहते हैं और प्रभु-दरबार में कठोर दण्ड भोगते हैं।॥ ३॥
14हे ईश्वर ! तू मेरा प्रभु है, मैं तेरी शरण में आया हूँ, मुझे अपने साथ मिला लो।
15हे जग के जीवन ! कृपा करके गुरु की शरण में रखो ।
16हे नानक ! परमात्मा ने स्वयं ही दयालु होकर उसे अपने साथ मिला लिया है॥ ४॥ १॥ ३॥
17मारू महला ४॥
18मैं हरि-नाम रूपी पूंजी के बारे में पूछता रहता हूँ, कोई मुझे बता दे कि यह धन राशि कहाँ से मिलती है।
19जो मुझे परमेश्वर से मिला दे, मैं उस पर कुर्बान जाता हूँ।
20मेरे अन्तर्मन में प्रियतम का बड़ा प्रेम है, मेरा सज्जन मुझे कैसे मिलेगा, जिससे मैं उसमें विलीन हो जाऊँ॥ १॥
21हे प्यारे मित्र मन ! हरि नाम ही मेरी धन-राशि है।
22पूर्ण गुरु ने मन में हरि-नाम दृढ़ करवाया है, उससे ही धीरज प्राप्त हुआ है और उसे ही हमारा नमन है॥ १॥ रहाउ॥
23हरि स्वयं ही गुरु से मिलाप करवाता है और वही घन-राशि का मार्गदर्शन करता है।
24हे भक्तजनो ! अपने मन में निर्णय करके देख लो, गुरु के बिना प्रभु प्रेम नहीं मिलता।
25हरि गुरु के मन में स्वयं निवास करता है, परमात्मा से मिलाप करवाने वाले उस गुरु को शाबाश है॥ २॥
26पूर्ण सतगुरु के पास भगवान् की भक्ति का गहन सागर सरीखा भण्डार है।
27सतगुरु प्रसन्न होकर भण्डार को खोलकर अपने शिष्यों को देता है और गुरुमुखों के हृदय में आलोक हो जाता है।
28स्वेच्छाचारी जीव कितने दुर्भाग्यशाली हैं जो नामामृत के सरोवर के पास रहकर प्यासे ही रह जाते हैं।॥ ३॥
29गुरु ही सबसे बड़ा दाता है, मैं उससे यही दान माँगता हूँ
30मुझ जैसे चिरकाल से बिछुड़े हुए को परमात्मा से मिला दो, मेरे मन-तन में एक यही अभिलाषा है।
31नानक विनती करते हैं कि यदि गुरु को मंजूर हो तो वह मेरी प्रार्थना सुन लेगा॥ ४॥ २॥ ४॥
32मारू महला ४॥
33गुरु ने हरि की कथा सुनाई है, गुरु के उपदेशानुसार हृदय में समा गई है।
34जिस खुशकिस्मत ने हरि-कथा का जाप किया है, उसे ही उत्तम निर्वाण-पद प्राप्त हुआ है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं