सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 993 · Raag Maaroo

1रागु मारू महला १ घरु ५

2ੴ सतिगुर प्रसादि॥

3वह रात-दिन जागता रहता है, उसे नींद नहीं आती।

4जिसे प्रेम-वेदना होती है, वही जानता है

5जिसके तन में प्रेम के तीर लगे हों, उसका उपचार वैद्य क्या कर सकता है ?॥ १॥

6परमात्मा जिसे स्तुतिगान में लगाता है, किसी विरले गुरुमुख को ही इस तथ्य की सूझ प्रदान करता है।

7जो अमृत का व्यापारी होता है, वही अमृत का महत्व समझता है॥ १॥ रहाउ॥

8जैसे पत्नी अपने पति से प्रेम करती है,

9वैसे ही अगर गुरु के शब्द द्वारा प्रभु में चित लगाया जाए तो

10जीव रूपी नारी सहज ही हो जाती है और उसकी तृष्णा की प्यास बुझ जाती है॥ २॥

11जीव रूपी नारी अपने संशय एवं भ्रम को मिटा देती है और

12सहज ही परमात्मा की स्तुति का तीर हृदय-रूपी धनुष पर चढ़ाती है।

13वह गुरु के शब्द द्वारा मन को मारकर अहंकार को समाप्त कर देती है, इस प्रकार वह सुन्दर प्रभु को पा लेती है॥ ३॥

14अहंकार की अग्नि में जलकर जो व्यक्ति मन से परमात्मा को भुला देता है,

15वह यमपुरी में खड्ग के भीष्ण दण्ड का पात्र बनता है।

16हे जीव ! अब हरि-नाम माँगने से भी नहीं मिलेगा, तुझे भारी दण्ड भोगना पड़ेगा।॥ ४॥

17जो मोह-माया की ममता के ख्यालों में प्रवृत्त रहेगा,

18वह यमपुरी में यम जाल में फंस जाएगा।

19जो मोह-माया के बन्धन तोड़ नहीं सकता, उसे यम ख्वार करता है॥ ५॥

20न में अब कुछ करता हूँ और न ही पहले कुछ किया है।

21यह नामामृत सतगुरु ने कृपा करके मुझे प्रदान किया है।

22नानक विनती करते हैं कि हे ईश्वर ! जिसे तू देता है, उसे अन्य प्रयास करने की कोई आवश्यकता नहीं, इसलिए मैं तेरी ही शरण में आया हूँ॥ ६॥ १॥ १२॥

23मारू महला ३ घरु १

24ੴ सतिगुर प्रसादि॥

25हे स्वामी ! तू जहाँ मुझे बिठाता है, मैं वहीं बैठता हूँ और जहाँ भेजता है, वहीं जाता हूँ।

26यह विश्व रूपी समूची नगरी का एक तू ही सम्राट है और सब स्थान पावन हैं।॥ १॥

27हे बाबा ! मुझे ऐसी सुसंगति में बसा दीजिए,

28जहाँ सत्य का स्तुतिगान करता रहूँ, जिससे मैं सहज ही समा जाऊँ॥ १॥ रहाउ॥

29बुरा-भला जो कुछ कर्म होता है, उसका कर्ता मैं खुद को मानता हूँ, यह अहम् ही सारे पापों का कारण है।

30परमात्मा के हुक्म से ही सारे संसार में सबकुछ हो रहा है॥ २॥

31इस काम-इन्द्रिय रूपी विकार को बहुत प्रबल कहा जाता है परन्तु यह इन्द्रिय किससे उत्पन्न हुई है?

32परमेश्वर स्वयं ही सारी लीला करता है, परन्तु इस तथ्य को कोई विरला ही बूझता है॥ ३॥

33गुरु की कृपा से जब परमेश्वर में लगन लग गई तो दुविधा का नाश हो गया।

34जो परमात्मा को मंजूर हैं, उसे ही सत्य मान लिया है, जिससे यम की फॉसी कट गई है॥ ४॥

35नानक कहते हैं कि जब मन का अभिमान ही चूक गया तो कर्मो का लेखा-जोखा कौन मॉग सकता है।

36जब सच्चे परमेश्वर की शरण में पड़ें तो यमराज भी डरता हुआ जाप करने लग गया।॥ ५॥ १॥

37मारू महला ३॥

38जिस जीव का अपने सच्चे घर में निवास हो जाता है, उसका आवागमन ही मिट जाता है।

39जिसे ईश्वर ने सत्य का कोष प्रदान किया है, वह स्वयं ही इस रहस्य को जानता है॥ १॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं