सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 991 · Raag Maaroo

1मारू महला १॥

2मैं मूल्य चुकाकर खरीदा हुआ मालिक का सेवक गुलाम हूँ और मेरा नाम भाग्यवान् पड़ गया है।

3मैं गुरु के वचन से दुकान पर बिका हुआ हूँ, जिधर मुझे लगाया है, मैं उधर ही लगा हूँ॥ १॥

4तेरे सेवक को कोई चतुराई नहीं आती,

5मुझसे मालिक के हुक्म का पालन भी अच्छी तरह नहीं होता॥ १॥ रहाउ॥

6मेरी माता तेरी दासी है, मेरा पिता भी तेरा दास है और दासों की औलाद हूँ।

7हे मेरे मालिक ! दास-दासी बनकर मेरे माता-पिता तेरी भक्ति में नाचते रहे, और अब मैं भी तेरी ही भक्ति करता हूँ॥ २॥

8हे स्वामी ! यदि तुझे प्यास लगी हो तो मैं तेरे पीने लिए पानी लेकर आऊँ। अगर कुछ खाना हो तो तेरे लिए दाने पीसने के लिए जाऊँ।

9मैं तुझे पंखा करता रहूँ, तेरे पैर मलता रहूँ और तेरा ही नाम जपता रहूँ॥ ३॥

10नानक कहते हैं कि हे मालिक ! इसके बावजूद भी मैं तेरा एहसान-फरामोश सेवक हूँ, यदि तू क्षमादान कर दे तो यह तेरा बड़प्पन है।

11युगों-युगान्तरों से केवल तू ही दयालु दाता है, तेरे बिना मुक्ति नहीं मिल सकती॥ ४॥ ६॥

12मारू महला १॥

13कोई भूत कहता है, तो कोई मुझे बेताल कह देता है और

14कोई कहता है कि यह आदमी तो बेचारा नानक ही है॥ १॥

15परन्तु सत्य तो यह है कि बावला नानक तो अपने मालिक का दीवाना हो गया है।

16में तो ईश्वर के अलावा अन्य किसी को नहीं जानता।॥ १॥ रहाउ॥

17वास्तव में उसे ही दीवाना समझना चाहिए, जो परमात्मा की भक्ति-भय में दीवाना हो जाए।

18वह परमेश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य को न जाने॥ २॥

19दीवाना तो उसे ही समझो, जो एक ही काम (प्रमु-भक्ति) करता हो।

20अपने मालिक के हुक्म को पहचानता हो, अन्य कोई चतुराई न करता हो॥ ३॥

21किसी को तभी दीवाना समझना चाहिए, जो मालिक का प्रेम हृदय में धारण करे।

22वह खुद को बुरा समझता हो और संसार को भला मानता हो।॥ ४॥ ७॥

23मारू महला १॥

24यह नाम रूपी धन सर्वव्यापी है परन्तु

25स्वेच्छाचारी जीव स्थान-स्थान भटकते हुए इसे दूर समझते हैं।॥ १॥

26नाम रूपी धन पदार्थ हमारे हृदय में ही मौजूद है।

27हे ईश्वर ! यह धन जिसे तू देता है, उसका उद्धार हो जाता है॥ १॥ रहाउ॥

28यह धन न तो अग्नि में जलता है और न ही चोर इसे चुरा कर ले जा सकते हैं।

29न यह धन पानी में डूबता है और न ही इस धन वाले को कोई दण्ड मिलता है।॥ २॥

30इस नाम-धन की कीर्ति देखो;

31इसके धनी का दिन-रात सहज ही मस्ती में व्यतीत हो जाता है॥ ३॥

32हे जिज्ञासुओ, एक अनूप बात सुनो;

33इस धन के बिना किसने परमगति प्राप्त की है॥ ४॥

34नानक अकथनीय परमेश्वर की कथा सुनाते हुए कहते हैं कि

35जिसे सतगुरु मिल जाता है, उसे यह धन प्राप्त हो जाता है।॥ ५॥ ८॥

36मारू महला १॥

37पिंगला नाड़ी को रेचक क्रिया द्वारा सुखा लो, इडा नाड़ी को पूरक क्रिया द्वारा प्राणवायु से भर लो। प्राणायाम की यह युक्ति उपयोग करके सुषुम्ना नाड़ी से संबंध जोड़ लो।

38चंचल मछली सरीखी ऐसी युक्ति से यदि मन को स्थिर करके रखा जाए तो फिर यह आत्मा भटकती नहीं और न ही यह शरीर रूपी दीवार ध्वस्त होती है।॥ १॥

39अरे मूर्ख ! क्यों भ्रम में भटक रहा है ?

40तूने परमानंद निर्लिप्त परमेश्वर की पहचान नहीं की॥ १॥ रहाउ॥

41अजर कामादिक विकारों को जला दो, मोह-माया को समाप्त कर दो, भ्रांतियों को छोड़कर नामामृत पान करो।

42चंचल मछली सरीखी ऐसी युक्ति से यदि मन को नियंत्रण में किया जाए तो आवागमन छूट जाता है, आत्मा न ही भटकती है और न ही शरीर रूपी दीवार ध्वस्त होती है।२॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं