गुरु ग्रंथ साहिब 990 · Raag Maaroo · Guru Nanak Dev Ji
1अरे भाई ! पाप रूपी पत्थरों से भरी हुई नैया द्वारा संसार-सागर से पार नहीं हुआ जाता।
2श्रद्धा-भक्ति रूपी नैया से ही जीव भवसागर से पार होता है।
3हे नानक ! यह श्रद्धा-भक्ति रूपी नैया परमेश्वर किसी विरले को ही प्रदान करता है॥ ४॥ २॥
4मारू महला १ घरु १॥
5आचरण कागज एवं मन स्याही की दवात है और बुरा-भला दो प्रकार के कर्म तकदीर में लिखे पड़े हैं।
6हे परमेश्वर ! तेरे गुणों का तो कोई अन्त नहीं है, जैसे-जैसे कर्म करवाता है, वैसे ही चलना पड़ता है॥ १॥
7हे बावले जीव ! मन में परमात्मा को याद क्यों नहीं करता ?
8भगवान को विस्मृत करने से तेरे गुण क्षीण हो जाते हैं।॥ १॥ रहाउ॥
9तुझे फँसाने के लिए रात्रेि जाली और दिन जाल बना हुआ है, जितनी घड़ियाँ हैं, उतनी ही मुसीबतें हैं।
10तू नित्य स्वाद ले लेकर विषय-विकार रूपी दाना चुगता रहता है और फँसता जा रहा है। अरे मूर्ख ! किस गुण से भला तेरा छुटकारा हो सकता है?॥ २॥
11शरीर एक भट्टी बना हुआ है, जिसमें मन लोहे के समान है और काम, क्रोध, मोह, लोभ एवं अहंकार रूपी पंचाग्नि इसे जला रही है।
12पाप रूपी कोयले इसके ऊपर पड़े हुए हैं, यह मन जल रहा है और तेरी चिंता छोटी चिमटी बनी हुई है॥ ३॥
13यदि गुरु मिल जाए तो लोहा रूपी मन स्वर्ण हो सकता है।
14हे नानक ! यदि वह तुझे नामामृत प्रदान कर दे तो तेरे शरीर में रहने वाला मन स्थिर हो सकता है।४॥ ३॥
15मारू महला १॥
16कमल का फूल एवं पानी का मलिन जाला यह दोनों ही सरोवर के निर्मल जल में रहते हैं।
17कमल का फूल पानी के मलिन जाले एवं अमृतमयी जल इन दोनों की संगत में रहता है परन्तु उसे उनकी संगत करने से कोई दोष नहीं लगता॥ १॥
18हे मेंढक ! तू कभी नहीं समझता।
19तू निर्मल जल में रहता है परन्तु पानी के मलिन जाले को खाता रहता है, तू अमृत रूपी जल के महत्व को नहीं जानता॥ १॥ रहाउ॥
20चाहे तू नित्य ही जल में रहता है,भँवरा जल में नहीं रहता परन्तु वह फूल का रस ऊपर से ही चूसता रहता है।
21अपने मन के ज्ञान के कारण कुमुदिनी चाँद को दूर से देखकर ही अपना शीश झुका देती है॥ २॥
22हे मेंढक ! तू बुद्धिमान बन जा, तुझे ज्ञान नहीं कि चीनी, दूध एवं शहद से मधुर अमृतमयी रस पदार्थ बन जाते हैं।
23जैसे जोंक थन से चिपक कर दुग्ध की बजाय रक्त चूषण करती है, वैसे ही तू भी कीचड़ की गंदगी खाने का अपना स्वभाव कभी नहीं छोड़ता॥ ३॥
24जैसे मूर्ख आदमी विद्वान पण्डितों से वेद-शास्त्र सुनता रहता है, परन्तु शिक्षा को ग्रहण न करने के कारण फिर भी वह ज्ञानहीन ही बना रहता है,
25जैसे कुत्ते की दुम सदा टेढ़ी ही रहती है, वैसे ही तू भी अपना स्वभाव नहीं छोड़ता॥ ४॥
26पाखण्डी लोग परमात्मा का नाम नहीं जपते किन्तु भक्तजन भगवान के चरणों में ही रत रहते हैं।
27हे नानक ! प्रत्येक जीव पूर्व जन्म में किए कमों का फल प्राप्त करता है, अतः अपनी जीभ से हरि-नाम का जाप करते रहो॥ ५॥ ४॥
28मारू महला १॥
29श्लोक॥
30भगवान के चरणों में मन लगाने से असंख्य पापी जीव पावन हो गए हैं।
31हे नानक ! प्रभु का नाम अड़सठ तीर्थ के (पुण्य-फल के) समान है, जिसका उत्तम भाग्य है, उसे ही यह मिला है॥ १॥
32शब्द॥
33हे अभिमानी सखी !
34मालिक की सुखदायक बात सुन॥ १॥
35हे माँ! अपने मन की वेदना में किसे कहकर सुनाऊँ ?
36हरि के बिना मैं रह नहीं सकती, फिर इन प्राणों को कैसे बचाऊँ ?॥ १॥ रहाउ॥
37मैं दुहागिन बहुत ही दुखी हूँ।
38जब जीव रूपी नारी का यौवन बीत गया तो उसे बड़ा पछतावा हुआ॥ २॥
39हे परमेश्वर ! तू मेरा चतुंर मालिक है, मैं तेरा सेवक हूँ,
40इसलिए तेरी ही खिदमत करता हूँ॥ ३॥
41नानक कहते हैं कि मुझे एक यही चिंता है कि
42प्रभु-दर्शन के बिना कैसे आनंद प्राप्त करूँ॥ ४॥ ५॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं