सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 988 · Raag Maalee Gauraa · Guru Arjan Dev Ji

1व्यर्थ के जंजाल एवं सब विकारों को तजकर नित्य भगवान का गुणगान करो।

2नानक दोनों हाथ जोड़कर परमात्मा से यही दान माँगता है कि मुझे अपना नाम प्रदान करो॥ २॥ १॥ ६॥

3माली गउड़ा महला ५।

4हे देवाधिदेव, तू सबकुछ करने में समर्थ व अपरम्पार है।

5तेरी अद्भुत लीलाएं कोई भी नहीं जानता और तेरी महिमा का कोई आर-पार नहीं है॥ १॥ रहाउ॥

6एक क्षण में पैदा करने एवं नष्ट करने वाला रचयिता परमेश्वर ही है और वही दुनिया को बनाने एवं मिटाने वाला है।

7उसने जितने भी जीव पैदा किए हैं, वह दातार सबको दान देता है॥ १॥

8हे महान्-अपरंपार परमेश्वर! तेरा दास तेरी शरण में आया है

9उसे विषम भवसागर से निकल लो दास नानक सदा तुझ पर न्यौछावर है।॥२॥२॥७॥

10माली गउड़ा महला ५।

11मेरे मन-तन में परमात्मा ही बस रहा है,

12वह दीनबंधु, भक्तवत्सल सर्वदा कृपा का भण्डार है॥ १॥ रहाउ॥

13हे परमेश्वर ! सृष्टि के आदि, अन्त एवं मध्य में तू ही है।

14(भूत, वर्तमान एवं भविष्य में) तेरे सिवा अन्य कोई नहीं है। एक स्वामी ही समूचे ब्रह्माण्ड में रमण कर रहा है॥ १॥

15में अपने कानों से हरि यश सुनता, नेत्रों से उसके ही दर्शन करता और रसना से हरि का गुणानुवाद करता हूँ।

16नानक तुझ पर सदा बलिहारी जाता है, मुझे अपना नाम प्रदान करो॥२॥३॥८॥६॥१४॥

17माली गउड़ा बाणी भगत नामदेव जी की

18ੴ सतिगुर प्रसादि॥

19प्रभु की बजने वाली बाँसुरी धन्य है,

20जिससे बहुत ही मधुर-मधुर अनाहत ध्वनि प्रकट हो रही है॥ १॥ रहाउ॥

21भेड़ की वह ऊन धन्य है,

22वह कामरी धन्य है, जो श्रीकृष्ण जी ने ओढ़ी है॥ १॥

23हे माता देवकी ! तू धन्य है,

24जिसके घर में कमलापति प्रभु हुआ है॥ २॥

25वृंदावन का वह वन स्थल भाग्यवान् है,

26जहाँ श्री नारायण खेलते रहे॥ ३॥

27वह बाँसुरी बजाता और गायें चराता रहता है,

28नामदेव का स्वामी आनंद करता रहता है॥ ४॥ १॥

29हे मेरे पिता माधव, हे केशव, हे साँवले बीठल ! तू धन्य है॥ १॥ रहाउ॥

30तू हाथ में सुदर्शन चक्र धारण करके वैकुण्ठ से आया था और तूने ग्राह से हाथी के प्राणों का उद्धार किया था।

31दुःशासन की सभा में द्रौपदी को निर्वस्त्र होने से तूने ही बचाया था॥ १॥

32तूने ही गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या का उद्धार किया था जो अभिशाप के कारण शिला बन गई थी। तूने कितने ही पतितों का कल्याण करके उन्हें पावन किया।

33इसलिए अधम एवं निम्न जाति वाला नामदेव तेरी ही शरण में आया है॥ २॥ २॥

34सब के शरीर में राम ही बोलता है,

35राम के अलावा अन्य कौन बोलता है॥ १॥ रहाउ॥

36मिट्टी एक ही है परन्तु उस मिट्टी से हाथी एवं चींटी रूपी अनेक प्रकार के जीव रूपी बर्तन हुए हैं।

37वृक्ष, पहाड़, मनुष्य, पशु-पक्षी, कीट-पतंगों सबमें राम ही समाया हुआ है। १॥

38अन्य सब आशाएँ त्यागकर एक परमेश्वर का ही चिंतन करो।

39नामदेव विनती करता है कि अब वह निष्काम हो गया है, इसलिए मालिक एवं दास में कोई भेद नहीं है॥ २॥ ३॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं