गुरु ग्रंथ साहिब 983 · Raag Nat Naaraayan · Guru Raam Daas Ji
1यदि मेरे सतगुरु के मन को उसकी बात ठीक नहीं लगी तो उसके किए सब श्रृंगार व्यर्थ हैं।॥ ३॥
2हे सखी-सहेली ! मटक-मटक कर प्रेमपूर्वक चलो, मेरे ठाकुर जी के गुणों को स्मरण करो।
3गुरु के दिशा-निर्देशानुसार की हुई सेवा ही मेरे प्रभु को अच्छी लगी है, सतगुरु ने अलख प्रभु को दिखा दिया है॥ ४॥
4जगत् में जितने भी नारी पुरुष हैं, उन सबका मालिक एक परमेश्वर ही है।
5जिन्हें संतजनों की चरण-धूलि मन में अच्छी लगी है, भक्तजनों से मिलकर उनकी मुक्ति हो गई है॥ ५॥
6मैं ग्राम-ग्राम एवं सब नगरों में परमात्मा को ढूंढता रहा हूँ परन्तु हरि-भक्तों ने उसे हृदय में ही पा लिया है।
7गुरु ने मन में श्रद्धा उत्पन्न करके परमात्मा से मिलाकर मेरा उद्धार कर दिया है॥ ६॥
8गुरु के शब्द का चिंतन करके जीवन-साँसों को सफल कर लिया है।
9अब अपने सच्चे घर में जाकर नामामृत का रस पान कर लिया है और इन नेत्रों के बिना ज्ञान-चक्षुओं से जगत् का मोह देख लिया है॥ ७॥
10हे ईश्वर ! हम तेरे गुण वर्णन नहीं कर सकते, तेरे सुन्दर घर में हम छोटे से कीड़े हैं।
11नानक वंदना करते हैं कि हे हरि ! कृपा करके मुझे गुरु से मिला दो,क्योकि तेरा नाम जपकर मन को धैर्य प्राप्त होता है॥ ८॥ ५॥
12नट महला ४॥
13हे मेरे मन ! अगम्य-अपार ईश्वर का भजन करो;
14हम बड़े पापी एवं गुणविहीन हैं परन्तु गुरु ने कृपा करके हमारा उद्धार कर दिया है॥ १॥ रहाउ॥
15जिसने साधु पुरुष साधुजन पा लिए हैं, उस गुरु के प्यारे से मैं एक विनती करता हूँ कि
16मुझे राम-नाम रूपी धन की पूंजी दे दो ताकि मेरी तृष्णा की भूख निवृत्त हो जाए॥ १॥
17पतंगा (दीये की रोशनी) मृग (नाद के कारण), भंवरा (फूल की सुगन्धि), हार्थी (कामवासना) और मछली (लोभवश) सभी एक-एक इन्द्रिय के दोष में नष्ट हो जाते हैं।
18किन्तु हमारे शरीर में पाँच बलि तत्व (काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार) मौजूद हैं, परन्तु गुरु-सतगुरु ही इन पापों से छुटकारा दिलवा सकता है॥ २॥
19हमने शास्त्रों एवं वेदों का भलीभांति अध्ययन किया और नारद मुनि के वचनों का भी निरीक्षण कर लिया है,
20सब यही पुकार कर कहते हैं कि राम-नाम का पाठ पढ़ो और परमगति पा लो, मगर गुरु की सत्संगति में ही मुक्ति संभव है॥ ३॥
21प्रियतम-प्रभु से ऐसी प्रीति लग गई है, जैसे कमल का फूल सूर्य को देखता रहता है,
22जैसे घटाएँ आने पर मेघ गरजते हैं तो वनों एवं पर्वतों में मोर खुशी-खुशी झूमते हुए नाचते हैं।॥ ४॥
23यदि शाक्त रूपी पेड़ को अमृत-जल से सीचो तो भी उसकी सब शाखाएँ, पत्र, फूल विषैले ही रहते हैं।
24ज्यों-ज्यों भला व्यक्ति मायावी व्यक्ति से नम्रता से बात करता है, वह उससे छेड़छाड़ द्वारा त्यों-त्यों विष रूपी कटु वचन ही बोलता है॥ ५॥
25संतों-साधुजनों के संग मिलकर रहना चाहिए चूंकि वे लोगों की भलाई के लिए शुभ वचन बोलते रहते हैं।
26जब किसी भद्रपुरुष को कोई संत मिल जाता है तो उसका मन यों खिल जाता है, जैसे जल में कमल संवर जाता है॥ ६॥
27लोभ की लहर में पड़ने वाला आदमी पागल कुते की तरह है, जो सब लोगों को काटकर वही बीमारी लगा देता है।
28जब मेरे ठाकुर जी के दरबार में इसकी खबर होती है तो गुरु ज्ञान-खड्ग लेकर इसका अन्त कर देता है॥ ७॥
29हे प्रभु ! कृपा करके मेरी रक्षा करो।
30नानक का कथन है कि मेरा अन्य कोई सहारा नहीं है परन्तु सतगुरु ही मुझे मुक्त कर सकता है॥ ८॥ ६॥ छका १॥ (महला ४ की छ: अष्टपदियों का संग्रह)
31First Set of Six Hymns||
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं