सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 981 · Raag Nat Naaraayan · Guru Raam Daas Ji

1हे नानक ! मैं प्रभु के दासों का दास यह सत्य कहता हूँ कि मैं दासों का पानी भरने वाला हूँ॥ ८॥ १॥

2नट महला ४॥

3हे राम ! हम गुणविहीन मात्र पत्थर ही हैं,

4लेकिन कृपा करके जब तूने गुरु से मिला दिया तो शब्द-गुरु द्वारा हम पत्थर भी संसार-सागर से पार हो गए॥५॥ रहाउ॥

5सतगुरु ने अत्यंत मीठा हरि-नाम दृढ़ करवाया है, जो चंदन से भी शीतल एवं महकदार है।

6प्रभु नाम के ध्यान से दस दिशाओं की जानकारी हुई है और हरि के गुणों की सुगन्धि सारे जगत् में फैली हुई है॥ १॥

7हे प्रभु ! तेरी गुणातीत कथा बड़ी मीठी है, गुरु के सुन्दर वचनों से ही इसका जाप किया है।

8गाते-गाते तेरे ही गुण गाए हैं और गुणगान करते हुए गुरु ने मेरा उद्धार कर दिया है॥ २॥

9गुरु विवेकवान् है, गुरु ही समदर्शी है, उससे साक्षात्कार करने से शंका की निवृति हो जाती है।

10सच्चे गुरु से मिलकर मोक्ष प्राप्त हो गया है और मैं सतगुरु पर ही बलिहारी जाता हूँ॥ ३॥

11कितने ही जीव अनेक पाखण्ड करते हुए भटकते रहते हैं, जग में लोभ एवं पाखण्ड करना बहुत बुरा है।

12इस तरह लोभी एवं पाखण्डी जीव इहलोक एवं परलोक में बहुत दुखी होते हैं और उन्हें यमराज का दण्ड भोगना पड़ता है।॥ ४॥

13जब सूर्योदय होता है तो जीव दुनिया के कार्यों में व्यस्त हो जाते हैं परन्तु ये मिथ्या धंधे विष रूपी माया का विस्तार है।

14जब रात्रि होती है तो जीव सपनों में फंस जाते हैं और सपनों में भी माया रूपी विष का दुख भोगते हैं।॥ ५॥

15जिस व्यक्ति ने बंजर खेत लेकर उसमें झूठ बोया है, उसके सभी खलिहान झूठ से भरे होते हैं।

16पदार्थवादी पुरुष सदा ही भूखे रहते हैं और दण्ड भोगने के लिए निर्दयी यम के द्वार पर खड़े होते हैं।॥ ६॥

17स्वेच्छाचारी जीव पर माया रूपी विष का भारी ऋण चढ़ा रहता है, पर यह ऋण शब्द के चिंतन ही उतरता है।

18जितने भी कर्ज माँगने वाले हैं, परमात्मा ने उन्हें सेवक बनाकर यमदूतों को उनसे कर्ज लेने से रोक दिया है।॥ ७॥

19सभी जीवों को जगत् के मालिक ने पैदा किया है किन्तु उसने उनके नाक में नकेल डाली हुई है।

20हे नानक ! जैसे प्रिय प्रभु को मंजूर होता है, वह जीवों की नकेल को खींचता है और वैसे ही वे चलते हैं अर्थात् परमात्मा की इच्छानुसार ही जीवों का जीवन चलता है॥८॥२॥

21नट महला ४॥

22हरि-नामामृत के सरोवर में ही स्नान करो।

23सतगुरु का ज्ञान ऐसा पावन स्नान है, जिससे सब पापों की मैल उतर जाती है। १॥ रहाउ॥

24अच्छी संगति का गुण बड़ा लाभदायक है, गणिका से राम नाम पढ़कर तोते ने उसका उद्धार कर दिया था। चूंकि तोता हर वक्त राम-राम बोलता रहता था और गणिका सुनती रहती थी।

25जब राजा कंस की मालिन कुविजा को श्रीकृष्ण के चरण-स्पर्श प्राप्त हुए तो उसका भी कल्याण हुआ और वह वैकुण्ठ सिधार गई॥ १॥

26अजामल ब्राह्मण ने अपने सबसे छोटे पुत्र नारायण से प्रीति की थी और अन्तिम समय उसने नारायण कहकर बुलाया।

27मेरे ठाकुर जी के मन में उसकी श्रद्धा बड़ी प्यारी लगी और यमदूतों को मार भगाया॥ २॥

28मनुष्य बड़ी-बड़ी बातें करता हुआ लोगों को सुनाता है लेकिन जो वह बोलता है, उस पर खुद विचार नहीं करता।

29जब उसे सत्संगति मिल जाती है तो उसके मन में आस्था पैदा हो जाती है एवं राम-नाम द्वारा उसकी मुक्ति हो जाती है॥ ३॥

30जब तक स्वस्थ शरीर में प्राण हैं, तब तक वह बिल्कुल भी भगवान को याद नहीं करता।

31जब उसके घर मन्दिर में आग लगती है तो वह कूप खोदकर आग बुझाने के लिए पानी निकालता है अर्थात् जब कोई भारी मुसीबत आती है तो ही वह भगवान को स्मरण करता है॥ ४॥

32हे मन ! शाक्त आदमी से कभी मेल-मिलाप मत करो, जिसने हरि-नाम हो भुला दिया है।

33शाक्त आदमी के वचन इतने कड़वे होते हैं जैसे बेिच्छु डंक मारता है, इसलिए शाक्त का संग छोड़कर परे हट जाना चाहिए॥ ५॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं