गुरु ग्रंथ साहिब 97 · Raag Maajh · Guru Arjan Dev Ji
1आपका दरबार देखे बिना न ही मुझे नींद आती है, न ही मेरी रात्रि बीतती है।
2मैं पूज्य गुरु के सच्चे दरबार पर तन-मन से कुर्बान जाता हूँ॥१॥ रहाउ॥
3मेरे भाग्य उदय हो गए हैं और संत-गुरु से मिल पाया हूँ।
4मैंने अनश्वर प्रभु को अपने हृदय-घर में ही प्राप्त कर लिया है।
5हे नानक ! मैं प्रभु के सेवकों की सेवा करता रहता हूँ और मैं उनसे एक पल अथवा क्षण मात्र भी जुदा नहीं होता।
6हे नानक ! मैं प्रभु के सेवकों पर तन एवं मन से कुर्बान जाता हूँ॥ रहाउ॥१॥८॥
7रागु माझ महला ५ ॥
8हे प्रभु ! वहीं ऋतु अति सुन्दर है जब मैं तेरा सिमरन करता हूँ।
9वहीं कार्य मुझे सुखदायक लगता है; जो कार्य मैं तेरे नाम-सिमरन के लिए करता हूँ।
10हे समस्त जीवों के दाता ! वही हृदय सुखी है, जिस हृदय में तुम्हारा निवास होता है।॥१॥
11हे मालिक ! तुम हम सब के संयुक्त पिता हो;
12तेरे पास नवनिधियाँ हैं, तेरा भण्डार अक्षय है।
13तू जिसे यह भण्डार देता है, वह मन और तन से तृप्त हो जाता है और वही तेरा भक्त बन जाता है।॥२॥
14हे मेरे मालिक ! सभी प्राणी तेरी आशा में ही बैठे हैं।
15तू घट-घट में वास कर रहा है।
16समस्त प्राणी तेरे भागीदार कहलाते हैं और किसी भी प्राणी को ऐसा नहीं लगता कि तुम उससे बाहर किसी अन्य स्थान पर निवास करते हो॥३॥
17गुरमुखों को तुम स्वयं ही बंधनों से मुक्त कराते हो
18और मनमुख प्राणियों को तुम स्वयं जीवन-मृत्यु के बंधन में धकेल देते हो।
19दास नानक तुझ पर कुर्बान जाता है; हे प्रभु! यह सबकुछ तेरा ही खेल तमाशा है॥ ४॥ २॥ ९॥
20माझ महला ५ ॥
21मेरे मन में सुखदायक अनहद शब्द मधुर ध्वनि में बजता रहता है।
22उस अनहद शब्द को सुनकर मेरा मन सदैव आनंदित एवं प्रसन्न रहता है।
23मन ने सहज गुफा में समाधि लगाई है और उच्चमण्डलों में अपना आसन बना लिया है॥१॥
24मन बाहर भटकने के पश्चात अपने आत्म स्वरूप रूपी घर में आया है।
25जिस प्रभु को पाने की कामना थी, उसे मैंने पा लिया है।
26हे सन्तजनो ! अब मेरा मन तृप्त तथा शांत हो गया है क्योंकि गुरदेव ने मुझे निडर स्वामी के दर्शन करवा दिए हैं॥२॥
27प्रभु स्वयं ही राजन है और स्वयं ही प्रजा है।
28वह स्वयं ही विरक्त है और स्वयं ही पदार्थों को भोगता है।
29सत्य प्रभु सिंघासन पर विराजमान होकर स्वयं ही सत्य का न्याय करता है, मेरे अन्तर्मन की चीख-पुकार दूर हो गई है॥३॥
30जैसा प्रभु मैंने देखा है, वैसा ही मैंने कह दिया है।
31जिसको यह भेद समझ आ गया उसे असीम रस की प्राप्ति हो जाती है ।
32जब मेरी ज्योति परम-ज्योति प्रभु में विलीन हो गई तो मुझे सुख उपलब्ध हो गया। हे नानक ! एक प्रभु का ही सारे जगत् में प्रसार हो रहा है॥ ४ ॥ ३ ॥ १० ॥
33माझ महला ५ ॥
34हे सखी ! जिस जीव-स्त्री के हृदय-घर में पति-प्रभु ने सुहाग बना लिया है अर्थात् अपना निवास कर लिया है,
35उसके हृदय-घर में मंगल गायन किया जाता है।
36जिस जीव-स्त्री को पति-प्रभु ने शुभ गुणों से अलंकृत कर दिया है, उसके हृदय-घर में आनंद एवं उल्लास बना रहता है।॥१॥
37जो जीव-स्त्री अपने पति-प्रभु को प्यारी लगती है, वही जीव-स्त्री गुणवान, भाग्यशालिनी,
38पुत्रवती, शीलवान एवं सुहागिन है
39और वह जीव-स्त्री रूपवान, चतुर एवं पटरानी है॥ २॥
40जो जीव-स्त्री पति-प्रभु के प्रेम में मग्न होकर सुन्दर बन जाती हैं, वही शुभ आचरण वाली एवं सर्वश्रेष्ठ है।
41उस ज्ञानवान को सभी श्रृंगार सुन्दर लगते हैं।
42जो पति-प्रभु के प्रेम में संवारी गई है, वही कुलीना एवं पटरानी हैं ॥३॥
43उसकी महिमा कथन नहीं की जा सकती,
44जिसे पति-प्रभु ने अपने गले से लगाकर अपने साथ मिला लिया है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं