सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 976 · Raag Nat Naaraayan · Guru Raam Daas Ji

1गुरु की कृपा से हरि-नाम का ध्यान किया है, अब तो हम सतगुरु की चरण-सेवा में ही लीन रहते हैं।॥ १॥ रहाउ॥

2हे जगन्नाथ, हे जगदीश्वर ! तू महान् है, जो मुझ पापी को अपनी शरण में रखा है।

3तू परमपुरुष एवं दीनों के दुख नाश करने वाला है। हे हरि ! तूने ही मेरे मुख में नाम-सिमरन की समर्था प्रदान की है॥ १॥

4हरि की महिमा सर्वोपरि है, अतः गुरु-सतगुरु के संग मिलकर मुझ नीच ने उसका ही गुणगान किया है।

5जैसे चंदन के संग नीम के वृक्ष में चंदन के गुण आ बसते हैं, वैसे ही हमारी दशा हो चुकी है॥ २॥

6मुझ में विषय विकारों के अनेक अवगुण हैं, जिन्हें मैं बार-बार हर क्षण करता रहता हूँ।

7मैं अवगुणी एवं भारी पत्थर बन गया हूँ परन्तु हरि ने अपने भक्तजनों की संगति द्वारा उद्धार कर दिया है॥ ३॥

8हे हरेि ! जिन भक्तों की तू रक्षा करता है, उनके सब पाप नष्ट हो जाते हैं।

9हे नानक के दयालु प्रभु स्वामी ! तूने हिरण्यकशिपु जैसे दुष्टों का भी निस्तारा कर दिया॥ ४॥ ३॥

10नट महला ४॥

11हे मेरे मन ! प्रेमपूर्वक ‘हरि-हरि' नाम जपो।

12जगदीश्वर हरि ने जब कृपा की तो संतों के चरणों में लगकर उसका ही भजन किया॥ १॥ रहाउ॥

13हम जन्म-जन्मांतर से भूले हुए थे किन्तु अब प्रभु की शरण में आ गए हैं।

14हे मेरे स्वामी ! तू सबका प्रतिपालक एवं शरणागत पर दया करने वाला है, मुझ सरीखे बड़े पापी की भी रक्षा करो।॥ १॥

15हे हरि ! संगति में आने वाले किस-किस का उद्धार नहीं हुआ ? तूने तो पतित जीवों को भी पावन कर दिया है।

16ब्राह्मणों ने ईश्वर का स्तुतिगान कर रहे भक्त नामदेव को दुष्ट-दुष्ट' कहकर निंदा की थी परन्तु प्रभु ने उसकी भी लाज रख ली थी॥ २॥

17हे स्वामी ! जो तुम्हारे गुण गाते हैं, मैं उन पर सदा न्यौछावर हूँ।

18जहाँ-जहाँ भक्तजनों की चरण-धूलि पड़ी है, वे सभी घर पवित्र हो गए हैं।॥ ३॥

19हे प्रभु! हम तुम्हारे गुण व्यक्त नहीं कर सकते चूंकि तू महान् एवं परमपुरुष है।

20नानक कहते हैं कि हे परमेश्वर ! हम पर ऐसी दया करो, ताकेि तेरे भक्तों की चरण-सेवा में रत रहें॥ ४॥ ४॥

21नट महला ४॥

22हे मेरे मन ! एकाग्रचित होकर हरि-नाम की उपासना करो।

23जब जगन्नाथ प्रभु ने कृपा की तो मेरी मति गुरु-मतानुसार नाम में प्रवृत्त हो गई॥ १॥

24गुरु से उपदेश सुनकर हरि-भक्तों ने हरि का ही यशोगान किया है।

25हरि-नाम ने उनके सब किल्विष-पाप ऐसे काट दिए हैं, जैसे कृषक खेतों को काट देता है॥ १॥

26हे परमेश्वर ! तेरी उपमा तू स्वयं ही जानता है, हम तेरे गुण व्यक्त नहीं कर सकते।

27हे प्रभु ! जैसे तुम हो, वैसे ही अपने गुणों को तुम्हीं जानते हो॥ २॥

28जीव माया के अनेक बन्धनों में फँसा हुआ है परन्तु हरि का जाप करने से ही बन्धनों से छूट सकता है।

29जैसे जल में मगरमच्छ ने हाथी को बांध लिया था परन्तु हरि को याद करने से उसका छुटकारा हो गया था॥ ३॥

30हे स्वामी, परब्रह्म-परमेश्वर ! युग-युगान्तरों से हम तुझे ही खोजते आ रहे हैं।

31हे नानक के प्रभु ! तेरी महिमा का अन्त नहीं पाया जा सकता॥ ४॥ ५॥

32नट महला ४॥

33हे मेरे मन ! कलियुग में परमेश्वर का कीर्ति-गान ही मंजूर होता है।

34दयालु प्रभु ने जब दया की तो गुरु-चरणों में लगकर हरि का ही जाप किया।॥ १॥ रहाउ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं