सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 973 · Raag Raamkalee · Bhagat Naam Dev Ji

1अपितु अखण्ड मण्डल निराकार में प्रवृत होकर अनाहत वीणा बजाता रहूँगा॥ १॥

2मैं वैरागी बनकर राम का गुणगान करूँगा और

3शब्द की अतीत अनाहद ध्वनि में रत होकर परमात्मा के घर जाऊँगा॥ १॥ रहाउ॥

4मैं इड़ा, पिंगला एवं सुषुम्ना में प्राणवायु को बांधे रखूंगा और

5चाँद-सूर्य दोनों को एक समान समझकर ब्रह्म-ज्योति में विलीन हो जाऊँगा॥ २॥

6तीर्थों के दर्शन करके स्नान करने के लिए जल में प्रवेश नहीं करूँगा और इस प्रकार जलचरों को नहीं सताऊँगा।

7गुरु ने अड़सठ तीर्थ मुझे अन्तर्मन में ही दिखा दिए हैं और अब मैं हृदय में ही स्नान करूँगा॥ ३॥

8मैं दुनिया में शोभा सुनकर भी भला पुरुष नहीं कहलाऊँगा।

9नामदेव कहते हैं कि मेरा मन परमात्मा में लीन रहकर शून्य समाधि में समा जाएगा॥ ४॥ २॥

10जब न कोई माता थी, न पिता था, न कोई कर्म एवं शरीर था,

11हम भी नहीं थे, तुम भी नहीं थे, तब कौन कहाँ से आया था?॥ १!!

12हे राम ! कोई किसी का साथी नहीं है,

13जैसे पेड़ों पर पक्षियों का बसेरा है, वैसे ही यह जगत्-प्रसार है॥ १॥ रहाउ॥

14जब चांद एवं सूर्य भी नहीं था, तब पवन एवं पानी को परमेश्वर ने स्वयं में मिलाया हुआ था।

15जब कोई शास्त्र एवं वेदों का भी जन्म नहीं हुआ था, तब कर्म कहाँ से आ गया॥ २॥

16गुरु की कृपा से खेचरी-भूचरी मुद्राएँ एवं तुलसी माला प्राप्त हो गई है।

17नामदेव विनती करते हैं कि परमतत्व परमेश्वर ही जगत् की उत्पति का कारण है और उसने स्वयं ही सतगुरु के रूप में भेद समझाया है॥ ३॥ ३॥

18रामकली घरु २॥

19यदि कोई व्यक्ति बनारस में उलटा लटक कर तपस्या करे, किसी तीर्थ पर मृत्यु की अभिलाषा करे, अपने शरीर को अग्नि में दहन करे, काया-कल्प करे,

20अश्वमेध यज्ञ करे, स्वर्ण का गुप्त दान करे, तो भी ये सभी कर्म राम-नाम के बराबर नहीं पहुँचते॥ १॥

21हे पाखण्डी ! इन सभी पाखण्डों को छोड़ दे और कपट मत कर।

22तुझे तो नित्य हरि का नाम स्मरण करना चाहिए॥ १॥ रहाउ॥

23यदि कोई गंगा एवं गोदावरी में जाकर कुम्भ के समय तीर्थ स्नान करें, चाहे केदारनाथ के दर्शन करे, यदि वह गोमती में स्नान करे और हजारों गाय दान कर दे,

24यदि वह करोड़ों बार तीर्थ-स्नान कर ले, चाहे अपना शरीर हिमालय पर्वत की बर्फ में गाल दे तो भी यह सब कर्म राम-नाम की उपमा में नहीं पहुँचते॥ २॥

25चाहे कोई अश्व-दान, गज-दान, श्रृंगारयुक्त सुन्दर नारी-दान, भूमि दान भी कर ले, ऐसा दान नित्य ही करता रहे।

26चाहे वह अपने मन को निर्मल कर ले और अपने बराबर तोलकर स्वर्ण-दान करे, तो भी सभी कर्म राम-नाम की तुलना में नहीं आते॥ ३॥

27मन में रोष नहीं करना चाहिए, यम को भी दोष नहीं देना चाहिए अपितु निर्मल निर्वाण पद की पहचान कर लेनी चाहिए।

28नामदेव विनती करते हैं कि दशरथ पुत्र श्री राम ही मेरा राजा है, परमतत्व नामामृत का पान करना चाहिए॥ ४॥ ४॥

29रामकली बाणी रविदास जी की

30ੴ सतिगुर प्रसादि॥

31चाहे हम सब हरि-नाम का पठन अथवा चिंतन कर लें या उसे कानों से सुन लें तो भी श्रद्धा एवं पूर्ण निष्ठा के बिना ईश्वर के दर्शन नहीं होते।

32लोहा शुद्ध स्वर्ण कैसे बन सकता है, जब तक वह पारस को स्पर्श न करे॥ १॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं