सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 972 · Raag Raamkalee · Bhagat Kabeer Ji

1जब नखशिख तक मन को पहचान लिया तो

2अन्तर्मन में तीर्थ-स्नान कर लिया॥ १॥

3प्राणों के पति मन का तुरीयावस्था में रहना ही बेहतर है,

4चूंकि इस अवस्था में न मृत्यु होती है, न जन्म होता है और न ही बुढ़ापे का रोग लगता है॥ १॥ रहाउ॥

5मैंने प्राणायाम द्वारा प्राण-वायु के बल से कुण्डलिनी शक्ति को सुषुम्ना नाड़ी में ऊपर की ओर चला लिया है और

6दसम द्वार में मार्ग पर चल पड़ा हूँ।

7मैंने अपनी ऑखों की भौहों के मध्य नासिका की जड़ में स्थित आज्ञा चक्र को भेद दिया है और

8दसम द्वार में पहुँच कर निर्भय प्रभु से भेंट हो गई है॥२॥

9अब माया का मोह चूक गया है।

10शशि रूपी शीतल ज्ञान ने सूर्य रूपी परिताप को निगल लिया है।

11जब कुंभक क्रिया द्वार प्राण-वायु को सुषुम्ना नाड़ी में भर लिया तो

12मन में अनाहत ध्वनि की वीणा बजने लगी॥३॥

13जब वक्ता गुरु ने मुखारविंद से ब्रह्म-शब्द सुनाया तो

14श्रोता शिष्य ने सुनकर उसे अपने मन में बसा लिया।

15वह श्रोता परमात्मा का नाम-स्मरण करके भवसागर से पार हो जाता है।

16कबीर जी कहते हैं कि नाम-स्मरण के अभ्यास का यही सार है॥ ४॥ १॥ १०॥

17चाँद एवं सूर्य दोनों ही ज्योति-रूप हैं,

18इनमें अनुपम ब्रह्म की ही ज्योति विद्यमान है॥ १॥

19हे ज्ञानी ! ब्रह्म का चिंतन करोः

20परमात्मा ने यह जगत्-प्रसार अपनी ज्योति में ही स्थित किया हुआ है॥ १॥ रहाउ॥

21हीरे के दर्शन करके परमात्मा रूपी हीरे को नमन करता हूँ।

22कबीर जी कहते हैं कि मायातीत परमेश्वर अलेख है॥ २॥ २॥ ११॥

23हे भाई ! दुनिया बेशक कितनी भी होशियार एवं सावधान है, मगर जागते हुए भी ठगी एवं लुटती जा रही है।

24वेद-शास्त्र जैसे होशियार पेहरेदारों के देखते हुए भी यम पकड़कर ले जाता है॥ १॥ रहाउ॥

25मूर्ख, गंवार एवं विमूढ़ व्यक्ति को सिंबल का पेड़ नारियल का पका फल लगता है।

26वह नीबू को आम समझता है और आम को नीबू समझता है। उसे पका केला झाड़ी लगता है अर्थात् मूर्ख को कोई ज्ञान नहीं होता॥ १॥

27ईश्वर रेत में बिखरी हुई चीनी के समान है, जो अहंकार रूपी हाथी बनकर चुगी नहीं जा सकती।

28कबीर जी कहते हैं कि यह चीनी कुल, जाति-पांति को त्याग कर नम्रता रूपी चींटी बनकर ही खाई जा सकती है॥ २॥ ३॥ १२॥

29बाणी नामदेउ जीउ की रामकली घरु १

30ੴ सतिगुर प्रसादि॥

31कागज को लाकर उसे काटकर लड़का उसकी पतंग बनाता है, फिर वह आकाश में उड़ती रहती है।

32वह अपने सज्जनों मित्रों से वार्तालाप भी करता रहता है परन्तु अपना चित्त पतंग की डोर में ही लगाकर रखता है॥ १॥

33मेरा मन राम-नाम में ऐसे बिंध गया है

34जैसे सुनार का मन स्वर्ण-कला में लगा रहता है॥ १॥ रहाउ॥

35एक नवयुवती शहर में से गागर लाकर उसे पानी से भर लेती है।

36वह अपनी सखियों के संग हँसती, विनोद करती एवं विचार-विमर्श भी करती रहती है, पर वह अपना चित्त उस गागर में ही रखती हैं।॥ २॥

37यदि दस द्वारों वाले घर में से गाय को घास चरने के लिए भेज दिया जाए तो

38पाँच कोस पर जाकर चरते हुए भी उसका चित्त अपने बछड़े में ही लगा रहता है॥ ३॥

39नामदेव जी कहते हैं कि हे त्रिलोचन ! जरा सुनो; माँ अपने शिशु को झूले में लिटा देती है किन्तु

40अन्दर-बाहर घर के कार्यों में व्यस्त रहकर भी अपना चित शिशु में ही लगाकर रखती है॥ ४॥ १॥

41मैं वेद, पुराण एवं शास्त्रों में लिखे अनंत गीत काव्यों का गुणगान नहीं करूंगा,

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं