गुरु ग्रंथ साहिब 971 · Raag Raamkalee · Bhagat Kabeer Ji
1हे गोविंद ! हम जीव ऐसे अपराधी हैं,
2जिस प्रभु ने प्राण, शरीर दिया था, उसकी कभी प्रेम-भक्ति नहीं की।॥ १॥ रहाउ॥
3पराए धन की लालसा, पराई नारी की कामना, पराई निंदा एवं पराए झंझटों से हम छूट नहीं सके,
4इसलिए पुनः पुनः हमारा जन्म मरण होता रहता है और यह कहानी कभी समाप्त ही नहीं होती।॥ २॥
5जिस घर में हरि-कथा होती है, वहाँ एक क्षण भर भी फेरा नहीं किया।
6हमारा तो लंपट, चोर, दुष्ट एवं शराबियों के संग ही सदा बसेरा रहा॥ ३॥
7काम, क्रोध, माया, अभिमान एवं ईर्षा इत्यादि यह संपति ही हमारे पास है।
8दया, धर्म और गुरु की सेवा इत्यादि शुभ-कर्म करने का ख्याल कभी सपने में भी नहीं आया॥ ४॥
9हे परमेश्वर ! तू दीनदयाल, कृपा का भण्डार, भक्तवत्सल एवं भयनाशक है।
10कबीर विनती करते हैं कि हे हरि ! अपने सेवक की विपत्ति से रक्षा करो, मैं हरदम तेरी सेवा करता रहूँगा॥ ५॥ ८॥
11सिमरन से मुक्ति का द्वार मिल जाता है,
12वैकुण्ठ में वास हो जाता है और
13संसार में निर्भय परमेश्वर के घर मंगल-वादन बजाया जाता है और
14सदा ही मन आनंद से भरपूर हो जाता है। १॥
15ऐसा सिमरन मन में करो
16सिमरन के बिना जीव की कभी मुक्ति नहीं होती॥ १॥ रहाउ॥
17जीस ईश्वर के सिमरन से कोई बाधा नहीं आती,
18वह बंधन से मुक्त कर देता है और किए पापों का भार उतर जाता है
19अपने हृदय में भगवान को नमन करो,
20इससे तेरा जन्म-मरण मिट जाएगा॥ २॥
21जिसके सिमरन से से तू मनोविनोद करता है,
22जिसने बिना तेल के प्रज्वलित कर अपनी ज्योति को तेरे हृदय में बसा रखा है,
23वह दीपक तुझे दुनिया में अमर कर देगा और
24यह काम, क्रोध अहम् रूपी विष को मार कर निकाल देगा।॥ ३॥
25जिस परमात्मा के स्मरण से तेरी गति होनी हैं,
26उस स्मरण को अपने कण्ठ में बसाकर रखो।
27वह स्मरण हमेशा ही करो, इसे कभी मत छोड़ो।
28गुरु के आशीर्वाद से तुम्हारा उद्धार हो जाएगा॥ ४॥
29जिस सिमरन द्वारा तू किसी पर निर्भर नहीं ,
30अपने सुन्दर घर में रेशमी चादर तान कर विश्राम करता है,
31तुझे निद्रा के लिए सुखद सेज तेरा दिल खुश रहता है,
32वह सिमरन तू रात-दिन किया कर॥ ५॥
33जिस ईश्वर होने से तेरी सब मुसीबतें दूर हो जाती हैं,
34जिस सिमरन द्वारा तुझे माया भी प्रभावित नहीं करती,
35परमेश्वर का सिमरन करके मन में उसका गुणगान करना चाहिए,
36परन्तु यह सिमरन सतगुरु से ही प्राप्त होता है।॥ ६॥
37दिन-रात सदैव भगवान का स्मरण करो।
38उठते-बैठते, श्वास लेते, भोजन करते समय,
39जागते-सोते वक्त नाम-स्मरण का आनंद भोगते रहो।
40भगवान का सिमरन संयोग से ही मिलता है।॥ ७॥
41जिस सिमरन द्वारा तुझे पापों का भार नहीं उठाना पड़ता,
42उस राम-नाम का सिमरन ही तेरा जीवनाधार है।
43कबीर जी कहते हैं कि जिस परमात्मा का कोई अन्त नहीं है,
44उसके आगे नाम के अलावा किसी प्रकार का कोई तंत्र-मंत्र नहीं चल सकता॥ ८॥ ६॥
45रामकली घरु २ बाणी कबीर जी की
46ੴ सतिगुर प्रसादि॥
47बन्धनों में फँसाने वाली माया ने बन्धन डाल दिया परन्तु
48मुक्तिदाता गुरु ने तृष्णा की अग्नि बुझा दी है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं