गुरु ग्रंथ साहिब 970 · Raag Raamkalee · Bhagat Kabeer Ji
1पूर्व जन्म से ही हम तुम्हारे सेवक हैं, इसलिए अब इस जन्म में भी तेरी सेवा किए बिना रहा नहीं जाता।
2तेरे द्वार पर अनहद शब्द की ध्वनि होती रहती है और तूने मेरे पर यह भक्ति की निशानी लगा दी है॥ २॥
3इस जगत् रूपी रणभूमि में वही शूरवीर दुष्टों जूझते हैं, जो चिन्हित होते हैं और बिना चिन्ह तो डर कर ही भाग जाते हैं।
4जो सच्चा साधु होता , उसे ही भक्ति की पहचान होती है और भगवान उसे अपने खजाने में शामिल कर लेता॥ ३॥
5मानव-शरीर रूपी कोठे में ही सत्य की कोठरी है, जो नाम-स्मरण द्वारा पावन हो जाती है।
6कबीर कहते हैं कि गुरु ने मुझे सत्य-नाम रूपी वस्तु प्रदान की है और कहा कि इस वस्तु को संभाल कर रखो॥ ४॥
7कबीर ने यह नाम रूपी वस्तु संसार के लोगों को भी वितरित कर दी है, परन्तु इसे भाग्यवान् ने ही हासिल किया है।
8जिस जीव रूपी नारी ने नाम रूपी अमृत रस प्राप्त किया है, उसका सुहाग अटल है॥ ५॥ ४॥
9जिस परब्रह्म के मुख से वेद एवं गायत्री निकले हैं, हे ब्राह्मण ! उसे क्यों विस्मृत करता है।
10हे पण्डित ! जिसके चरणों में समूचा जगत् लगता है, तू उस हरि को क्यों नहीं स्मरण करता॥ १॥
11हे ब्राह्मण ! क्योंकर हरि का नाम नहीं जपता ?
12हे पाण्डे ! तू राम नाम नहीं बोलता, तेरी नरक में जाने की संभावना है॥ १॥ रहाउ॥
13तू खुद को उच्च जाति का समझता है किन्तु नीचों के घर भोजन करता है, तू तो हठ कर्म करके अपना पेट भरता है।
14तू चौदस एवं अमावस्या के आधार पर अपने यजमानों से दान माँगता रहता है और हाथ में दीपक लेकर कूप में भी पड़ता है॥ २॥
15तू ब्राह्मण है और मैं काशी का जुलाहा हूँ, फिर तेरी और मेरी बराबरी कैसे हो सकती है ?
16अरे पाण्डे ! हमारा तो राम नाम जपने से उद्धार हो गया है, परन्तु तू वेदों के भरोसे पर डूब मरेंगा॥ ३॥ ५॥
17ईश्वर एक पेड़ है, मनुष्य, पशु-पक्षी, कीट-पतंगे एवं अन्य जीव इस पेड़ की डालियाँ, शाखाएँ, पुष्प, पत्र-रस इत्यादि हैं।
18यह सृष्टि (नाम रूपी) अमृत की वाटिका है, जिसे परमेश्वर ने स्वयं ही पैदा किया है। १ ।
19मैंने राजा राम की (रचना की) कहानी जान ली है।
20सब जीवों के अन्तर्मन में राम की ज्योति का ही प्रकाश है, पर किसी विरले गुरुमुख ने ही इस भेद को समझा है॥ १॥ रहाउ॥
21एक जीव रूपी भंवरा इस पेड़ के पुष्प के रस में बिंध गया है, प्राणवायु ने प्राणायाम के अभ्यास द्वारा उस भंवरे को बारह पंखुड़ियों वाले अनाहत कमल में धारण कर दिया और
22फिर उस भंवरे ने सोलह पंखुड़ियों वाले विशुद्ध कमल पर चढ़कर प्राणवायु को झकझोरा, तदुपरांत यह भंवरा उड़कर दशम द्वार में जा चढ़ा॥ २॥
23वहाँ अनहद शब्द की आनंदमय ध्वनि में सत्य-नाम रुपी पौधा उत्पन्न हो गया, जिसने उसकी शरीर रूपी धरती पर मंडराते हुए तृष्णा बादल को सुखा दिया है,
24कबीर कहते हैं कि मैं उस भक्त का सेवक हूँ, जिसने सत्य-नाम रूपी पौधे को देखा है॥ ३॥ ६॥
25कानों में मौन धारण को मुद्राएँ पहनो, दया को अपनी कफ़नी बनाओ और विचार अर्थात् नाम-स्मरण को अपना खप्पर बनाओ ।
26अपने इस शरीर को पावन रखने की खिंथा सी लो और नाम को अपना जीवनाधार बनाओ॥ १॥
27हे योगी ! ऐसा योग कमाओ।
28गृहस्थ में रहकर गुरु के निर्देशानुसार नाम-स्मरण करते रहो, यही जप-तप एवं संयम है। १॥ रहाउ॥
29बुद्धि को निर्मल रखने की विभूति अपने शरीर पर लगाओ और अपनी सुरति से प्रभु का ध्यान करो, यही सिंगी बजाओ।
30प्रभु-मिलन का वैराग्य पैदा करके शरीर रूपी नगरी में मन की यह किंगुरी बजाते रहो॥ २॥
31निर्विकल्प समाधि यूँ लगी रहती है कि पंचतत्व के शुभ गुणों को लेकर अपने हृदय में बसा लो।
32कबीर कहते हैं कि हे संतजनो ! ध्यानपूर्वक सुनो, धर्म एवं दया को अपनी वाटिका बना लो॥ ३॥ ७॥
33किस काम के लिए जग में हमें उत्पन्न किया है और जन्म लेकर हमने क्या फल प्राप्त किया है ?
34उस मोक्षदाता, संसार-सागर से पार करने वाले, चिंतामणि परमेश्वर में एक क्षण भी यह मन नहीं लगाया॥ १॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं