गुरु ग्रंथ साहिब 96 · Raag Maajh · Guru Raam Daas Ji
1वह हरि के सेवक धन्य हैं, जिन्होंने हरि-प्रभु को समझ लिया है।
2मैं जाकर ऐसे सेवकों से हरि की बातें पूछता हूँ।
3मैं उनके चरण दबाता हूँ और उन्हें स्वच्छ करता एवं धोता हूँ; हरि के सेवकों से भेंट करके मैं हरि-रस का पान करता हूँ॥२॥
4दाता सतिगुरु ने मेरे हृदय में ईश्वर का नाम बसा दिया है।
5परम सौभाग्य से मुझे गुरु के दर्शन प्राप्त हुए हैं।
6सतिगुरु सत्य अमृत रस का पान करते हैं और सत्य अमृत वाणी ही बोलते हैं; अतः पूर्ण गुरु से अमृत नाम प्राप्त करो॥३॥
7हे प्रभु ! मुझे सद्पुरुषों की संगति में मिलाओ।
8पवित्र पुरुषों की सभा में मिलकर मैं हरि के नाम की आराधना करता रहूँ।
9हे नानक ! मैं हरि कथा ही सुनता हूँ और अपने मुँह से वाणी ही बोलता हूँ; गुरु के उपदेश द्वारा हरि के नाम से मैं तृप्त हो जाता हूँ॥४॥६॥
10माझ महला ४ ॥
11हे मेरी प्यारी सत्संगी बहनो ! तुम मुझे आकर मिलो।
12जो मुझे मेरे प्रियतम प्रभु का पता बताएगी, मैं उस पर कुर्बान हो जाऊँगी।
13सत्संग में मिलकर मैंने अपने साजन हरि को ढूंढ लिया है, अपने सतिगुरु पर में बलिहारी जाती हूँ॥१॥
14जँहा कहीं भी मैं देखती हूँ, उधर ही मैं अपने स्वामी को देखती हूँ।
15हे अन्तर्यामी प्रभु ! तू सर्वत्र व्यापक है।
16पूर्ण गुरु ने मेरे परमेश्वर को मेरे साथ ह्रदय में बसता दिखा दिया है; मैं सतिगुरु पर हमेशा कुर्बान जाती हूँ॥२॥
17समस्त शरीरों में एक ही पवन है, एक ही मिट्टी है और सबमें एक ही ज्योति विद्यमान है।
18भिन्न-भिन्न शरीरों में एक ही ज्योति कार्य कर रही है; परन्तु एक शरीर की ज्योति दूसरे शरीर की ज्योति में नहीं मिलाई जा सकती।
19गुरु की कृपा से मुझे एक परमात्मा ही सबमें मौजूद दिखाई देता है। मैं अपने सतिगुरु पर न्योछावर हूँ॥३॥
20सेवक नानक अमृत वाणी उच्चारण करता है।
21गुरु के सिक्खों के हृदय को यह वाणी बड़ी प्यारी एवं अच्छी लगती है।
22पूर्ण सतिगुरु वाणी द्वारा उपदेश देते हैं और वह सतिगुरु बड़े परोपकारी हैं।॥४॥७॥
23सात चउपदे सतिगुरु रामदास जी के हैं।
24माझ महला ५ चउपदे घरु १ ॥
25मेरे मन को गुरु के दर्शनों की तीव्र अभिलाषा हो रही है।
26यह चातक की भाँति विलाप करता है।
27हे सन्तजनों के प्रिय ! आपके दर्शनों के बिना मेरी प्यास नहीं बुझती और न ही मुझे शांति प्राप्त होती है।॥१॥
28हे संत जनों के प्रिय ! गुरु के दर्शनों पर मैं तन, मन से न्योछावर हूँ और सदैव ही कुर्बान जाता हूँ॥१॥ रहाउ॥
29हे मेरे गुरु ! तेरा मुख अति सुन्दर है और तेरी वाणी की ध्वनि मन को आनंद प्रदान करती है।
30हे सारंगपाणि ! तेरे दर्शन किए मुझे चिरकाल हो चुका है।
31हे मेरे सज्जन एवं मित्र प्रभु ! वह धरती धन्य है जहाँ तुम वास करते हो॥२॥
32हे मेरे सज्जन एवं मित्र प्रभु रूप गुरु जी ! मैं आप पर तन-मन से न्यौछावर हूँ और आप पर कुर्बान जाता हूँ॥ १॥ रहाउ ॥
33यदि मैं तुझे एक क्षण भर नहीं मिलता तो मेरे लिए कलियुग उदय हो जाता है।
34हे मेरे प्रिय भगवान ! मैं तुझे अब कब मिलूंगा?
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं