सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 967 · Raag Raamkalee · Bhatt Sathaa & Balvand

1संगत के लिए गुरु के शब्द द्वारा लंगर चलता रहता है परन्तु उसमें कोई कमी नहीं आती।

2अपने मालिक की दी हुई भी सेवन करते रहते हैं और याचकों को भरपूर भिक्षा-दान देते रहते हैं।

3जिस वक्त गुरु अंगद देव जी के दरबार में ईश्वर का स्तुतिगान किया जाता है, उस वक्त वैकुण्ठ एवं देवलोक से भी नूर बरसता है।

4हे सच्चे पातशाह गुरु जी ! तेरे दर्शन करके जन्म-जन्मांतर की पापों की मैल भी कट जाती है।

5गुरु के शिष्य कहते है केि गुरु नानक देव जी ने गुरु अंगद देव जी को गुरुयाई देने का सच्चा हुक्म किया है, अतः हम उस हुक्म की अवहेलना कैसे कर सकते है?

6गुरु नानक देव जी के पुत्रो ने उनके हुक्म का पालन नहीं नहीं किया कि वे गुरु अंगद देव जी को अपना गुरु-पीर मानें, अपितु वे तो उनसे विमुख हो गए।

7खोटे दिलों वाले होने के कारण वे हुक्म मानने से विद्रोही होकर फिरते हैं और पापों का भार उठाकर घूमते रहते हैं।

8जिस गुरु नानक ने जो बात कही, गुरु अंगद देव जी ने वही बात कर दी। गुरु अंगद देव जी ने गुरु नानक के हुक्म का पालन किया है, इसलिए उन्हें गुरु स्थापित किया गया।

9देख लो, हुक्म मानने की इस खेल में (भाई लहणा एवं गुरु पुत्रों में) कौन बाजी हार गया है और कौन जीत गया है॥ २॥

10जिस (भाई लहणा) ने हुक्म का पालन किया, वही गुरु रूप में पूज्य हो गया। चावल और भूसी इन दोनों में कौन उत्तम है अर्थात् भाई लहणा एवं गुरु-पुत्रों में कौन श्रेष्ठ है?

11धर्मराज रूपी देवता दोनों तरफ के गुण देखकर ही फैसला करता है।

12गुरु अंगद सर्वश्रेष्ठ हैं और अपने सेवकों की बातें सुनकर उन्हें प्रभु से मिलाने की मध्यस्थता करते हैं।

13सच्चा परमेश्वर वही करता है वचन सतगुरु अंगद देव जी कहते हैं और उनकी कही हुई बात तुरंत ही पूरी हो जाती है। अंगद देव जी की गुरुगद्दी की घोषणा हो गई तो सच्चे परमात्मा ने स्वयं ही गुरुयाई की पुष्टि दी।

14गुरु नानक देव जी अपनी काया पलट कर स्वयं ही गुरु-सिंहासन पर विराजमान हुए हैं उनके सैकड़ों ही सिक्ख हैं।

15गुरु अंगद देव जी की सिक्ख संगत उनके द्वार पर खड़ी स्तुति करती रहती है और संगत का मन पापों से यों पवित्र हो रहा है जैसे जंगाली हुई धातु जी को अपने मालिक (गुरु नानक) के द्वार उनके मुँह पर लाली आ जाती है।

16दरवेश गुरु अंगद देव जी को अपने मालिक (गुरु नानक ) के द्वार से सत्य की देंन प्राप्त हुई है और वाणी गाने से उनके मुँह पर लाली आ जाती है।

17बलवंड कहता है की गुरु अंगद देव जी की पत्नी माता खीवी जी बहुत भली स्त्री है जिनकी छाँव पत्राली की तरह घनी है अर्थात उनके पास बैठने से सबको बहुत सुख और शांति मिलती है।

18माता जी की निगरानी में गुरु के लंगर में घृतयुक्त खीर वितरित की जाती है, जिसका स्वाद अमृत समान मीठा है।

19यहाँ गुरु के शिष्यों के मुख सदा उज्ज्वल रहते हैं किन्तु मनमुख जल भून गए हैं और उनकी कोई पूछ नहीं होती।

20गुरु अंगद देव ने जब शूरवीरों वाली साधना की तो ही वे अपने मालिक को स्वीकार हुए।

21माता खीवी जी के पतेि गुरु अंगद देव जी ऐसे शूरवीर हैं, जिन्होंने सारी पृथ्वी का भार अपने सिर पर उठा लिया है॥ ३॥

22दुनिया कहती है कि गुरु नानक देव जी ने भला यह क्या किया है (अपने सेवक भाई लहणा को गुरुगद्दी देकर तो) उन्होंने गंगा अन्य ही दिशा बहा दी है।

23जगन्नाथ, ईश्वर रूप गुरु नानक देव जी ने (अपने शिष्य को गुरु बनाकर) बहुत ऊँची बात कर दी है।

24उन्होंने अपने ध्यान को विध्याचल पर्वत रूपी मथनी और मन को वासुकि नाग रूपी रस्सी बनाकर शब्द रूपी क्षीर सागर का मंथन किया है,

25जिससे चौदह रत्न रूपी सरीखे चौदह गुण निकाल लिए हैं और इनके द्वारा जन्म-मरण के चक्र वाले जगत् को चमका दिया है।

26गुरु नानक देव जी ने भाई लहणा जी के शरीर को ठोक बजाकर देखा एवं उन्हें परखकर सिक्ख संगत को यह करिश्मा दिखा दिया है कि वही गुरुगद्दी का हकदार है।

27इस प्रकार भाई लहणा जी के सिर पर गुरुयाई का छत्र धर दिया और उनकी कीर्ति का चंदोआ आसमान तक तान दिया।

28तत्पश्चात् उनकी ज्योति भाई लहणा (गुरु अंगद देव) की ज्योति में समा गई और गुरु नानक ने स्वयं ही अपने स्वरूप को गुरु अंगद के स्वरूप में मिला दिया।

29गुरु नानक देव जी ने अपने सिक्खों एवं पुत्रों को भलीभांति परखकर जो कुछ किया है, सारी संगत ने उसे देख लिया है।

30जब भाई लहणा पवित्र-पावन हो गया तो ही उन्हें गुरु-गद्दी पर विराजमान करके गुरु नियुक्त किया गया॥ ४॥

31फिर भाई फेरू जी के पुत्र सतिगुरु अंगद देव जी ने करतारपुर से आकर खडूर नगर बसा दिया।

32हे गुरु अंगद ! जप, तप एवं संयम तेरे साथ रहता है, परन्तु अन्य जगत् के साथ घमण्ड बसता है।

33जैसे बूर पानी को खराब कर देता है, वैसे ही लोभ ने मनुष्य को बर्बाद कर दिया है।

34गुरु अंगद देव जी के दरबार में कुदरती नूर बरसता है।

35हे गुरु ! तू शान्ति का वह स्रोत है, जिसकी गहराई को कोई भी समझ नहीं सकता।

36तेरे हृदय में नवनिधि वाला नाम रूपी कोष भरा हुआ है।

37जो तेरी निंदा करता है, वह चूर-चूर होकर नष्ट हो जाता है।

38लोगों को तो निकट का मृत्युलोक ही नजर आता है परन्तु तुझे तो दूर का परलोक भी सूझता है।

39फिर भाई फेरू जी के पुत्र गुरु अंगद देव जी ने करतारपुर से आकर खडूर नगर बसा दिया॥ ५॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं