सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 966 · Raag Raamkalee · Guru Arjan Dev Ji

1हे सच्चे मालिक ! तेरे वे भक्त धन्य हैं, जिन्होंने तेरे दर्शन किए हैं।

2जिस पर तेरी दया होती है, वही तेरी स्तुति करता है।

3हे नानक ! जिसकी गुरु से भेंट हो जाती है, वह निर्मल एवं शुद्ध आचरण वाला हो जाता है।२०॥

4श्लोक महला ५॥

5हे फरीद ! यह जगत् रूपी धरती बड़ी रंगीली है परन्तु इसमें विकारों का विषैला बगीचा लगा हुआ है।

6जिस व्यक्ति पर गुरु-पीर ने अपनी कृपा कर दी है, उसे दुख रूपी कोई ऑच नहीं लगती॥ १॥

7महला ५॥

8हे फरीद ! यह मनुष्य-जन्म बड़ा सुहावना है और साथ ही यह शरीर बड़ा सुन्दर है।

9जिनका प्यारे प्रभु से प्रेम होता है, ऐसे विरले ही उसे पाते हैं।॥ २॥

10पउड़ी ।

11जप, तप, संयम, दया एवं धर्म इत्यादि शुभ गुण जिसे ईश्वर देता है, वही पाता है।

12वह जिसकी तृष्णाग्नि बुझा देता है, वही हरि-नाम का ध्यान करता है।

13अन्तर्यामी, अगम्य, पुरुषोत्तम प्रभु जिस पर अपनी कृपा-दृष्टि की झलक दिखा देता है,

14ऐसा जीव साधु की संगति के सहारे प्रभु से लगन लगा लेता है।

15ऐसे जीव के अवगुण मिट जाते हैं, उसका मुख उज्ज्वल हो जाता है और वह हरि-नाम द्वारा भवसागर से तैर जाता है।

16परमात्मा जिसका जन्म-मरण का भय काट देता है, वह दोबारा योनियों में नहीं पड़ता।

17ईश्वर ने स्वयं ही अपने ऑचल से लगाकर अंधकूप में से बाहर निकाल लिया है।

18हे नानक ! भगवान ने कृपा करके अपने साथ मिला लिया है और उसे गले से लगाकर रखता है॥ २१॥

19श्लोक महला ५॥

20जिसे खुदा से मुहब्बत हो जाती है, वह उसके रंग में ही रत रहता है।

21हे नानक ! ऐसे मनुष्य विरले ही मिलते हैं, जिनका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता॥ १॥

22महला ५॥

23मेरा मन सत्य-नाम से बिंधा हुआ है और बाहर भी परम-सत्य ही दिखाई दे रहा है।

24ईश्वर विश्वव्यापक है और वह वन, तृण, तीनों लोकों एवं रोम-रोम में समाया हुआ है।

25पउड़ी।

26परमात्मा ने स्वयं ही सृष्टि-रचना की है और स्वयं ही इसमें लीन है।

27वह स्वयं ही अपने एक सगुण रूप में हो गया और स्वयं ही अनेक रूपों में प्रगट हुआ है।

28वह स्वयं ही सब जीवों में समाया हुआ है और स्वयं ही बाहर भी विद्यमान है।

29वह स्वयं ही जीवों को दूर नजर आता है और स्वयं ही प्रत्यक्ष है।

30वह स्वयं ही गुप्त एवं प्रगट होता रहता है।

31हे ईश्वर ! तेरी कुदरत रचना का महत्व कोई भी नहीं पा सका।

32तू गहनगम्भीर, अथाह, अपार एवं बेअंत है।

33नानक कहते हैं कि हे प्रभु ! एक तू ही कण-कण में मौजूद है, केवल एक तू ही है॥ २२॥ १॥ २॥ शुद्ध॥

34रामकली की वार राइ बलवंडि तथा सतै डूमि आखी

35ੴ सतिगुर प्रसादि॥

36यदि कर्ता-परमेश्वर स्वयं ही न्यायपूर्ण निर्णय करे तो उसके आदेश पर एतराज नहीं किया जा सकता।

37दैवी गुण सच्चे बहन-भाई हैं जिसे इंश्वर दान देता है, वही कामयाब होता है।(भाई लहणा को गुरु-गद्दी मिलना परमेश्वर का विधान था, गुरुपुत्र बेशक विरोध करते रहे लेकिन दैवी गुणों के कारण भाई लहणा ही इसको हकदार बने)।

38सतगुरु नानक देव जी ने जगत् में धर्म का राज चलाया और बड़ी मजबूत आधारशिला रखकर सत्य का एक दुर्ग बना दिया।

39तदुपरांत उन्होंने भाई लहणा (गुरु अंगद देव) के सिर पर गुरुयाई का छत्र रख दिया और वे भी परमेश्वर की स्तुति करके अमृत का पान करते रहे।

40गुरु नानक ने प्रभुज्ञान की खड्ग रूपी मति अपने आत्मबल से लहणा जी के हृदय में स्थापित कर दी।

41गुरु नानक देव जी ने जीते जी अपने शिष्य भाई लहणा जी के आगे नमन किया और

42अपने जिंदा रहते समय उन्हें गुरुयाई का तिलक लगा दिया॥ १॥

43गुरु नानक देव जी की श्रद्धापूर्वक सेवा से जब भाई लहणा जी को गुरुगद्दी प्राप्त हुई तो उनकी शोभा चारों दिशाओं में फैल गई।

44भाई लहणा जी गुरु नानक देव जी वाली वही ज्योति थी और उनकी जीवन-युक्ति भी वही है, मालिक प्रभु ने केवल उनका शरीर ही बदला है।

45भाई लहणा जी के सिर पर सुन्दर निरंजन का छत्र झूलता है और वे सिंहासन ग्रहण करके गुरु-गद्दी पर विराजमान हो गए हैं।

46गुरु नानक ने उन्हें जो हुक्म किया है, वे वही करते हैं और चाहे सत्य का मार्ग बड़ा दुर्गम है, मगर उन्होंने उस पर ही चलने का निर्णय किया।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं