गुरु ग्रंथ साहिब 965 · Raag Raamkalee · Guru Arjan Dev Ji
1उसने गुरु की मतानुसार अपनी आत्मा को जीतकर अनश्वर प्रभु को पा लिया है।
2जिसने परमात्मा का मनन किया है, उसका कलियुग में उद्धार हो गया है।
3जो जीव साधु की संगति में मिलकर निर्मल हो गया है, उसने अड़सठ तीर्थों का स्नान कर लिया है।
4वही पुरुष सौभाग्यशाली है, जिसे अपना प्रभु मिल गया है।
5हे नानक ! मैं उस व्यक्ति पर बलिहारी जाता हूँ, जिसके इतने अहोभाग्य हैं॥ १७॥
6श्लोक महला ५॥
7जब प्रिय प्रभु हृदय-घर में था तो माया रुपी नारी बाहर थी,
8जब प्रिय-प्रभु हृदय-घर से बाहर था तो माया रूपी नारी घर की चौधरानी बन गई
9नामविहीन जीव अनेक भटकनों में पड़कर भटकता रहता है।
10सतगुरु ने जीव रूपी नारी को उसके हृदय में ही प्रत्यक्ष दिखा दिया है।
11हे नानक ! अब जीव रूपी नारी सत्य-नाम द्वारा सत्य में ही विलीन हो गई है॥ १॥
12महला ५॥
13मनुष्य जीवन में सब प्रकार के उद्यम करता रहता है परन्तु उससे एक नाम जपने का उद्यम नहीं होता।
14हे नानक ! कोई विरला मनुष्य ही इस तथ्य को बूझता है, जिस उद्यम द्वारा समूचे जगत् का उद्धार हो जाता है॥ २॥
15पउड़ी॥
16हे परमेश्वर ! तेरी पदवी सर्वोपरि है।
17अनेक प्रकार के तेरे रंगों वाले कौतुक समझे नहीं जा सकते।
18सब जीवों में प्राण तेरे ही धारण किए हुए हैं और तू सबकुछ जानता है।
19सबकुछ तेरे वश में है और तेरा यह जगत् रूपी घर बहुत ही भला है।
20तेरे घर में बड़ा आनंद एवं भरपूर खुशियों हैं।
21अपने इतने बड़े मान, बड़ाई एवं तेज प्रताप को तू स्वयं ही भोगता है।
22जहाँ-कहीं तू दृष्टिगत होता है, तू सर्वकला भरपूर है।
23हे प्रभु ! तेरे दासों का दास नानक तेरे आगे ही विनती करता है॥ १८॥
24श्लोक महला ५॥
25हे प्रभु ! नभ रूपी छत से बने हुए चौदह लोक जैसे बाजार हैं और तेरे नाम के जीव रूपी व्यापारी ही सुन्दर लगते हैं।
26हे नानक ! वही धनवान् हैं जो हरि-नाम रूपी अमूल्य वस्तु का लाभ हासिल करते हैं।॥ १॥
27महला ५॥
28हे कबीर ! संसार में कोई भी हमारा अपना नहीं है और न ही हम किसी के साथी हैं।
29जिस परमेश्वर ने रचना की है, हम सभी ने उसमें ही विलीन हो जाना है॥ २॥
30पउड़ी॥
31हरेि एक ऐसा सुन्दर पेड़ है, जिसे नामामृत रूपी सुन्दर फल लगे हुए हैं।
32यह मन हरि को पाने का तीव्र अभिलाषी है, फिर उसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है ?
33वह अगम्य, अजेय है और वर्ण एवं चिन्ह से परे है।
34वह मेरा प्राण-प्रेिय है, जो यह भेद खोल दे।
35हे मित्र ! मैं तुम्हारी सेवा करता रहूँगा, मुझे सज्जन-प्रभु के बारे में बताओ।
36मैं तुझ पर कुर्बान हूँ और तुझ पर ही न्योछावर हूँ
37अपना चित लगाकर मेरी बात सुनो, यह भेद प्यारे संत ही बताते हैं।
38हे दास नानक ! जिसकी तकदीर में लिखा हुआ है, सतगुरु ने उसे ही नामामृत प्रदान किया है॥ १६॥
39श्लोक महला ५॥
40हे कबीर ! साधुओं की धरती पर यद्यपि दुष्ट-तरकर आकर बैठ गए हैं,
41धरती को उनके पापों के भार का कोई फर्क नहीं पड़ता किन्तु दुष्टों को उनकी संगति से लाभ ही प्राप्त होता है॥ १॥
42महला ५॥
43हे कबीर ! जैसे चावलों के कारण भूसी को भी मूसलों से कूटा जाता है,
44वैसे ही जो व्यक्ति बुरी संगति में बैठते हैं तो यमराज उन्हें भी दण्ड देने के लिए उनसे पूछताछ करता है॥ २॥
45पउड़ी॥
46हे परमेश्वर ! तू स्वयं ही बड़े परिवार वाला है और स्वयं ही अकेला रहने वाला है।
47तू अपने गुणों की कीमत स्वयं ही जानता है।
48तू स्वयंभू है और तूने स्वयं ही जगत् को उत्पन्न किया है।
49जो कुछ तूने पैदा किया है, तूने स्वयं ही उसे बयान किया है।
50वह स्थान धन्य है, जहाँ तू रहता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं