सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 960 · Raag Raamkalee · Guru Arjan Dev Ji

1नानक तो परमात्मा से एक यही दान माँगता है कि मुझे अपने दर्शन दीजिए एवं मन में सदैव प्रेम बना रहे| २॥

2पउड़ी।

3हे परमेश्वर ! जिसे तू याद आता है, उसे सदा ही सुख मिलता रहता है।

4जिसे तू स्मरण होता है, उसका मृत्यु का दुख समाप्त हो जाता है।

5जिसे तू याद आता है, उसे किस प्रकार की चिंता हो सकती है।

6कर्ता परमेश्वर जिसका मित्र बन जाता है, उसका प्रत्येक कार्य साकार हो जाता है।

7जिसे तू याद आता है, उसका जन्म सफल हो जाता है।

8जिसे तू स्मरण आता है, वह धन-ऐश्वर्य से सम्पन्न हो जाता है।

9जिसे तेरी याद आती है, वह बड़े परिवार वाला हो जाता है।

10हे परमात्मा ! जिसे तू याद आता है, उसकी वंशावलि का भी कल्याण हो जाता है॥ ६॥

11श्लोक महला ५।

12ढोंगी पण्डित अपने मन से भी अन्धा है और अपनी बाहरी करतूतों से भी अन्धा अर्थात् ज्ञानहीन है, पर झूठमूठ ही विष्णु के भजन गाता रहता है।

13वह अपने शरीर को स्नान करवाता है और माथे पर धार्मिक चक्र बनाता है, वह धन-दौलत के लिए बहुत भागदौड़ करता है।

14उसके मन की मैल दूर नहीं होती और अहम् में पुनः पुनः जन्म मरण के चक्र में पड़ा रहता है।

15वह निद्रा में ग्रस्त एवं कामवासना का दुखी किया हुआ मुँह से हरि-हरि कहता रहता है।

16उसका नाम तो वैष्णो है किन्तु अपने कर्मों द्वारा वह अभिमान से जुड़ा हुआ है, छिलकों को कूट कर क्या फल प्राप्त हो सकता है ?

17हंसों में बैठा हुआ बगुला हंस नहीं बनता और यह हंसों में बैठा हुआ भी नित्य मछली पकड़ने के लिए ध्यान लगाकर रखता है

18जब हंस अपनी सभा में सोच विचार कर देखते हैं तो उनका बगुले से गठजोड़ कभी बनता ही नहीं।

19हंस तो हीरे-मोती चुगते हैं किन्तु बगुला मेंढकों को ढूँढने जाता है।

20बेचारा बगुला हंसों की डार में से उड़ गया है कि शायद मुझे कोई पहचान न ले।

21जिस किसी को जिस ओर परमात्मा ने लगाया है, वह उस ओर लगा हुआ है, जब परमेश्वर को यूँ ही भाता है फिर किसो को क्या दोष दिया जाये?

22सतगुरु मन रूपी रत्नो से भरा हुआ सरोवर है, जिसे गुरु प्राप्त हो जाता है, उसे गुण रूपी रत्न हासिल हो जाते हैं।

23सतगुरु के हुक्म से शिष्य रूपी हंस उस सरोवर में इकट्ठे हो जाते हैं।

24गुरु रूपी सरोवर में गुण रूपी रत्न एवं माणिक्य पदार्थ भरे हुए हैं और शिष्य रूपी हंस उन्हें सेवन करते एवं अन्यों को भी करवाते हैं परन्तु वे कभी समाप्त नहीं होते।

25परमेश्वर को यही मंजूर होता है कि शिष्य रूपी हंस गुरु रूपी सरोवर से कभी दूर न हों।

26हे नानक ! वही शिष्य गुरु के पास आता है, जिसके माथे पर जन्म से ऐसा भाग्य लिखा होता है।

27ऐसा शिष्य स्वयं तो भवसागर से तैर जाता है, अपने समूचे परिवार का उद्धार करवा देता है और सारी दुनिया का भी कल्याण करवाता है।१॥

28महला ५।

29अनेक मार्गों (शास्त्रों) का ज्ञाता होने के कारण जीव पण्डित तो कहलाता है किन्तु कठोर मोठ जैसा बन जाता है जो पकने से पकता नहीं।

30मन में मोह के कारन वह नित्य भ्र्म में फँसा रहता और उसका शरीर कहीं भी स्थिर नहीं होता।

31उसे नित्य धन की लालसा लगी रहती है, इसलिए वह मिथ्या माया के मोह में फंसकर आवागमन में पड़ा रहता है।

32यदि कोई उसे सत्य कहता है तो उसे खीझ आती है, चूंकि उसके मन में बड़ा क्रोध भरा हुआ है।

33दुर्मति एवं खोटी बुद्धि में फंसा हुआ वह महांमूर्ख है और उसके मन में माया का मोह लगा हुआ है।

34अन्य ठगों के साथ ही यह एक पण्डित ठग भी मिल आया है और इन सब की संगत भी एक जैसी है।

35जब गुरु रूपी सराफ उस ठग पण्डित को अपनी नजर में से निकालता है अर्थात् उसकी परख करता है तो पण्डित रूपी लोहा निकल आया है।

36वह पण्डित रूपी लोहा अन्य शुद्ध सोने में मिला मिलाकर बहुत स्थानों पर दिया गया किन्तु उसका पदा खुलता रहा और वह अपने लोहे के रूप में सबके सामने खड़ा होता रहा।

37यदि वह पण्डित गुरु की शरण में आ जाए तो वह जले हुए लोहे से पुनः सोना बन जाए।

38सतगुरु निर्वेर है, उसके लिए पुत्र एवं शत्रु सब एक समान हैं। वह उन सभी के अवगुणों को काटकर उनके शरीर को शुद्ध कर देता है।

39हे नानक ! जिसके भाग्य में जन्म से ही लिखा होता है, उसका ही सतगुरु से स्नेह होता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं